सृष्टि के प्राणियों को दुखी देख उनके कल्याण हेतु माता पार्वती के द्वारा पूछे गए प्रश्नों के जवाब में भगवान शिव कहते हैं, कि प्रियतमे ! पुण्येन जायते पुत्रः पुण्येन लभते श्रियम।पुण्येन रोगनाशः स्यात सर्वशास्त्रेण सम्मतः। अर्थात पुण्यकर्मो के करने से ही वंश की वृद्धि होती है, पुण्यकर्म करने से ही जीव कीर्तिवान होता है। पुण्य कर्मों में लगे रहने से शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं ऐसा सभी शास्त्रों का मत है। इसलिए सभी प्राणियों को अपना पुण्यकोष कभी भी रिक्त नहीं होने देना चाहिए। वैसे तो वर्ष के सभी महीनों की मास शिवरात्रि का एक-एक पल पुण्य फलकारक माना गया है किन्तु, फाल्गुन माह की 'माहशिवरात्रि' का प्रत्येक क्षण अधिकाधिक महत्व रखता है शात्र कहते हैं कि, मा भुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटि शतैरऽपि।अवश्यमेव भोक्तव्यम् कृते कर्म शुभाशुभं।अर्थात मनुष्य को अपने द्वारा किये हुए पाप-पुण्य जनित कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है।जबतक जीव अपने शुभाशुभ कर्मो का फल भोग नही लेता, तबतक उसे बारम्बार जन्म पर जन्म लेना ही पड़ता है। जीव पाप करके भी तभी तक सुखी रह पाता है जब तक की उसके द्वारा संचित पुण्य कर्मों का कोष खाली नहीं हो जाता। पुण्य का कोष खाली होते पाप कर्मो का फल मिलने लगता है, फिर जीव इतना परेशान हो जाता है कि उसे बचने का कोई भी मार्ग दिखाई नहीं देता।
फाल्गुन माह की श्रीमहाशिवरात्रि माह इसी पुण्य को पुनः वृद्धि करने का वरदान है। स्वयं भगवान शिव माता पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी और अपने शिवगणों सहित इस दिन अपने भक्तों के द्वारा किये जाने वाले पूजन-श्रीरुद्राभिषेक का तत्क्षण फल प्रदान करते हैं। शिव जब जीव का संहार करते हैं तो महाकाल बन जाते हैं। प्रसन्न रहने पर 'महामृत्युंजय' बनकर उसी जीव की रक्षा भी करते हैं तो शंकर बनकर सभी जीवात्माओं का भरण पोषण भी करते हैं। योगियों के सूक्ष्मतत्व 'महारूद्र' बनकर योगियों-साधकों के अंतस्थल में विराजते हैं और रूद्र बनकर महाविनाश लीला भी करते हैं ।
अर्थात स्वयं शिव ही ब्रह्मा और विष्णु के रूप में एकाकार देवो के देव महादेव बन जाते हैं। इन्ही महादेव को प्रसन्न करने के लिए अच्छे अवसर के रूप में श्री महाशिवरात्रि का पावन पर्व 21 फरवरी शुक्रवार को है। शिव की आराधना पंचामृत से करें तो अति उत्तम रहेगा। शिव की ही ऐसी पूजा है जिसमे केवल पत्रं पुष्पं फलं तोयं अर्थात- पत्र, पुष्प, फल और जल से करके भी पूर्ण फल प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए इसदिन आपके पास सामग्री नहीं हो तो भी इन्हीं मंत्रों से श्रद्धा-विश्वास के साथ जलाभिषेक करते हुए भगवान शिव कि पूजा करें और ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय का जप करते रहें, साथ ही ॐ नमो भगवते रुद्राय, का जप भी कर सकते हैं।
ऐसा जपते हुए बेलपत्र पर चन्दन या अष्टगंध राम-राम लिख कर शिव पर चढ़ाएं। पुत्र पाने की इच्छा रखने वाले शिवभक्त दूध अथवा मंदार पुष्प से, घर में सुख शान्ति चाहने वाले धतूरे के पुष्प अथवा फल से, शत्रुओं पर विजय पाने वाले अथवा मुकदमों में सफलता कि इच्छा रखने वाले लोग भांग से शिव कि पूजा करें तो सभी तरह की पराजित होने वाली संभावनाएं समाप्त हो जाएंगी। कर्ज से मुक्ति पाने वाले भक्त शहद और घी से रुद्राभिषेक करें।
अधिक मान सम्मान और यश प्राप्ति की कामना करने वाले भक्तों को गुलाब जल से अभिषेक करना चाहिए जबकि विद्यार्थियों को प्रतियोगिता में अच्छी कामयाबी के लिए दूध और मिश्री को मिश्रित करके शिवअभिषेक करें। संपूर्ण कष्टों और पुनर्जन्मो से मुक्ति चाहने वाले मनुष्य गंगा जल और पंचामृत चढाते हुए ॐ नमो भगवते रुद्राय ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नों रुद्रः प्रचोदयात।मंत्र को पढ़ते हुए सभी सामग्री जो भी यथा संभव हो उसे लेकर समर्पण भाव से शिव अर्पित करें।श्रद्धा भाव और विश्वास के साथ जो भी करेंगे महादेव आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करेंगे।