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Maha kumbh 2025: मौनी अमावस्या पर इस विधि से करें घर पर स्नान, अमृत स्नान जैसा मिलेगा लाभ

Wed, 29 Jan 2025 01:12 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Mahakumbh 2025 Second Amrit snan: हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को मौनी अमावस्या मनाई जाती है, जिसे माघी अमावस्या भी कहते हैं। इस साल 29 जनवरी 2025 यानी की आज बुधवार के दिन मौनी अमावस्या मनाई जा रही है।
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Mahakumbh 2025 Amrit Snan - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Mahakumbh 2025 Second Amrit snan: हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को मौनी अमावस्या मनाई जाती है, जिसे माघी अमावस्या भी कहते हैं। इस साल 29 जनवरी 2025 यानी की आज बुधवार के दिन मौनी अमावस्या मनाई जा रही है। इस वर्ष महाकुंभ होने के कारण इस तिथि को बेहद कल्याणकारी माना जा रहा है। बता दें आस्था के महापर्व महाकुंभ में आज दूसरा अमृत स्नान किया जा रहा है, यहां देश-विदेश से हजारों की संख्या में साधु संत और श्रद्धालु पवित्र डुबकी लगाने के लिए आ रहे हैं। मान्यता है कि महाकुंभ में डुबकी लगाने से साधक के कष्टों का निवारण होता है, और उसके भाग्य में भी वृद्धि के योग बनते हैं। वहीं इस दौरान कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो महाकुंभ में स्नान के लिए नहीं पहुंच पा रहे हैं, ऐसे में आप घर पर इस विधि के अनुसार स्नान कर सकते है, जिससे अमृत स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है, आइए इसके बारे में जानते हैं।

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इस विधि से करें स्नान
ज्योतिषियों के अनुसार घर पर अमृत स्नान करने के लिए आप सबसे पहले जल में थोड़ी गौ रज यानी की गाय के गोबर की राख मिला लें। इसके बाद स्नान करें और “त्रिवेणी माधवं सोमं भरद्वाजं च वासुकिम्। वन्दे अक्षय वटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम।।” मंत्र का जाप करें। ध्यान रखें इस स्नान को करते समय साबुन का उपयोग न करें। अब स्नान के बाद आप साफ वस्त्रों को धारण करें। अब अपने दाहिने हाथ में दूब घास की 16 गांठें लेकर देवी-देवताओं का ध्यान करें,  इस दौरान मौन रहकर मन को शांत रखें। अंत में सूर्य देव को अर्घ्य दें। 
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आप पूजा के दौरान पितृ सूक्तम् का पाठ भी कर सकते हैं, इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है

पितृ सूक्तम् का पाठ
उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥

अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥

ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥

त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।
तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥

त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।
वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥

त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।
तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥

बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥

आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥

उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥

आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥

अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥

येऽ अग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥

अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥

आसीनासोऽ अरूणीनाम् उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरः तस्य वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात॥



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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