अर्थात- माघ में शीतल जल में डुबकी लगाने से मनुष्य पापमुक्त होकर स्वर्गलोग चले जाते हैं। सभी बारह महीनों में केवल माघ का महीना ही ऐसा है जिसमें सूर्य के मकर राशि पर आ जाने से देवता भी अपना-अपना लोक छोड़कर माहपर्यंत पृथ्वी पर प्रयाग तीर्थ में एकत्रित होकर स्नान-दान आदि करते हैं। माना जाता है कि प्रयाग तीर्थ के संगम तट पर स्वयं देवता भी मनुष्य रूप धारण करके भजन-सत्संग आदि करते हैं और कल्पवास करने वालों के लिए भोजन आदि का प्रबंधन भी करते हैं।
अपना-अपना वेष बदलकर परमेश्वर के सत्संग का आनंद भी लेते हैं। इस दिन सभी देवी-देवता अंतिम बार स्नान करके अपने-अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप इसी दिन दिन से संगम तट पर गंगा, यमुना एवं सरस्वती की जल राशिओं का स्तर कम होने लगता है। सभी श्रद्धालुओं को इस दिन प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, गोदावरी, शिप्रा आदि अनेकों तीर्थों नदियों समुद्रों आदि में प्रातः स्नान, सूर्य अर्घ्य, जप-तप दानादि करने से ब्रह्मचारी, गृहस्त, वानप्रस्थ, संन्यासी, बालक, तरुण, बृद्ध, नपुंसक आदि सभी प्राणी दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से मुक्ति मिल जाती है।
शास्त्र कहते हैं कि यदि माघ पूर्णिमा के दिन संयोगवश पुष्य नक्षत्र पड़ जाय तो तिथि का पुण्य अक्षुण हों जाता है। इस दिन किया गया सत्कर्म अमोघ फलदाई रहेगा अतः इस दिन सुवर्ण, तिल, कम्बल, पुस्तकें, पंचांग, कपास के वस्त्र और अन्नादि दान करने से सुकृत्य मिलता है। पूर्णिमा का महत्व केकयी पुत्र भरत के इस शपथ से भी ज्ञात होता है कि, जब राम लक्ष्मण माता सीता साहित वन चले गये तो कुछ अवधवासियों ने माँ कौशल्या से कहा कि भरत का इसमें हित छुपा है, जब भारत ननिहाल से वापस आये तो अपनी माँ कैकयी को कोसते हुये माँ कौशल्या से कहा कि माँ भगवान श्रीराम के वनगमन में यदि मेरी किंचितमात्र भी सम्मति रही हो तो देवताओं द्वारा पूजित और अनेकों पुण्यों को प्रदान करने वाली वैसाख, कार्तिक और माघ पूर्णिमाएँ मेरे बिना स्नानदानादि ही व्यतीत हों और मुझे निम्नगति प्राप्त हो। इस महान शपथ को सुनते ही प्रेममयी माँ कौशल्या ने भरत को गले लगा लिया। सभी भक्तों को इस अक्षुण पुण्यदायक माघ पूर्णिमा के पावनपर्व का लाभ उठाना चाहिए।