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कजरी तीज की पौराणिक व्रत कथा
लोक मान्यता के अनुसार, एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। एक बार भाद्रपद महीने में कजरी तीज का पर्व आया। ब्राह्मणी ने श्रद्धापूर्वक तीज माता का व्रत रखा। व्रत के लिए उसे चने के सत्तू की जरूरत थी। उसने अपने पति से कहा कि वह कहीं से सत्तू लेकर आए, ताकि वह विधि-विधान से पूजा कर सके। ब्राह्मण बहुत गरीब था। उसने पत्नी से कहा कि उसके पास सत्तू खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। इस पर ब्राह्मणी ने जिद करते हुए कहा कि चाहे किसी तरह इंतजाम करना पड़े, लेकिन उसके लिए सत्तू जरूर लेकर आए।
पत्नी की बात मानकर ब्राह्मण रात के समय एक साहूकार की दुकान पर पहुंचा। वहां उसने चने की दाल, घी और शक्कर लेकर करीब सवा किलो सत्तू तैयार किया। जैसे ही वह वहां से निकलने लगा, दुकान के कर्मचारियों को आहट सुनाई दी। उन्होंने शोर मचाकर उसे पकड़ लिया और साहूकार को बुला लिया। साहूकार ने ब्राह्मण से चोरी करने का कारण पूछा। ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर अपनी मजबूरी बताई। उसने कहा कि वह कोई चोर नहीं है और उसकी पत्नी ने कजरी तीज का व्रत रखा है। व्रत के लिए सत्तू की आवश्यकता थी, लेकिन गरीबी के कारण वह उसे खरीद नहीं सकता था। इसलिए उसने केवल सवा किलो सत्तू तैयार किया है।
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साहूकार ने ब्राह्मण की तलाशी ली। उसके पास सत्तू के अलावा कोई दूसरी वस्तु नहीं मिली। ब्राह्मण की सच्चाई और उसकी पत्नी की श्रद्धा देखकर साहूकार का मन पिघल गया। उसने ब्राह्मण को माफ कर दिया और उसकी पत्नी को अपनी धर्म बहन मान लिया। इसके बाद साहूकार ने ब्राह्मण को सत्तू के साथ गहने, रुपये, मेहंदी, लच्छा और अन्य सामान भी दिया। इस तरह ब्राह्मण खाली हाथ नहीं, बल्कि सम्मान और खुशी के साथ अपने घर लौटा।
उधर ब्राह्मणी चांद निकलने का इंतजार कर रही थी। पति के लौटने पर दोनों ने मिलकर कजरी तीज की पूजा की और माता का आशीर्वाद लिया। मान्यता है कि तीज माता की कृपा से उस गरीब ब्राह्मण के परिवार के दिन बदल गए और उनके जीवन में सुख-समृद्धि आई। कजरी तीज की इस लोककथा के अंत में यही कामना की जाती है कि जिस तरह ब्राह्मण के जीवन में खुशियां आईं, उसी तरह तीज माता की कृपा से सभी के घर में सुख-शांति, समृद्धि और सौभाग्य बना रहे।
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