शास्त्रों में जया एकादशी का महत्व
पद्म पुराण में जया एकादशी का विशेष उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि यह एकादशी समस्त पापों को हरने वाली होती है। जो भक्त इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ करते हैं, उन्हें मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापकर्म समाप्त हो जाते हैं और वह सांसारिक कष्टों से मुक्त होकर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करता है। इसे करने से पुण्य प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मान्यता है कि यह एकादशी व्रत व्यक्ति को भूत, प्रेत और पिशाच योनि से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करने में सहायक होता है। जो भी श्रद्धालु इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु की उपासना करते हैं, उन्हें वैकुंठ प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
जया एकादशी की पूजा विधि
इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर भगवान विष्णु की प्रतिमा को पीले वस्त्र अर्पित करें। पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से भगवान का अभिषेक करें और फिर चंदन, तुलसीदल, धूप-दीप, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी विधिवत पूजा करें। इसके बाद एकादशी व्रत की कथा का श्रवण करें और श्री विष्णु सहस्रनाम या भगवद्गीता का पाठ करें। इस दिन रात्रि जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करने का विशेष महत्व होता है। अगले दिन द्वादशी तिथि को व्रत का पारण करें और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर भोजन कराएं।
जया एकादशी पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्गलोक में इंद्रदेव के दरबार में माल्यवान नामक एक गंधर्व रहता था, जिसे पुष्पवती नामक अप्सरा से प्रेम हो गया। एक दिन जब इंद्रदेव के दरबार में विशेष आयोजन था, तब माल्यवान और पुष्पवती एक-दूसरे में इतने लीन हो गए कि अपने कर्तव्यों की अवहेलना कर बैठे। इंद्रदेव को जब यह पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर दोनों को पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
इस श्राप के कारण वे दोनों मृत्युलोक में भटकने लगे और अत्यंत कष्टमय जीवन जीने लगे। संयोगवश एक दिन जया एकादशी आई और उन्होंने दिनभर अन्न ग्रहण नहीं किया। रात को अत्यधिक कष्ट में होने के कारण वे सो नहीं पाए और भगवान विष्णु के स्मरण में रात जागते रहे। इस तरह अनजाने में ही उनका व्रत पूरा हो गया। भगवान विष्णु की कृपा से इस व्रत का पुण्य उन्हें प्राप्त हुआ और वे पुनः अपने गंधर्व स्वरूप में लौट आए।