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होलिका दहन के पहले नहीं मनाने चाहिए 'होली मिलन समारोह'

Fri, 18 Mar 2016 07:25 PM IST
पवन कुमार गुप्ता/ज्योतिषाचार्य
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holi - फोटो : bureau, amar ujala
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हिंदू संस्कृति में होलिका दहन के बाद ही 'होली मिलन समारोह' करने की परंपरा रही है लेकिन आजकल देखा जा रहा है कि कुछ लोग होलिका दहन के पहले ही होली मिलन समारोह मनाते हैं जो कि गलत है। कॉरपोरेट कल्चर के चलते ये चलन और बढ़ गया है।
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ऑफिसों में भी लोग होली की छुट्टियों से पहले ही होली मिलन समारोह कर लेते हैं। हिंदू परंपरा के मुताबिक ऐसा करना ठीक नहीं है।

होली दहन से पहले व होली दहन तक केवल तंत्र-मंत्र व पूजा वाले कर्म कांड की ही परंपरा रही है औैर होली दहन के बाद रंगों के माध्यम से धुलेंडी को मानने की। इसलिए आजकल होली दहन से पहले होने वाले "होली मिलन समारोह" हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं। इस तरह के "होली मिलन समारोह"होलिका दहन के बाद ही मनाना चाहिए।
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होली के बाद क्यों मनाई जाती है धुलेंडी?

होली हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है लेकिन इसे दो दिन यानी होली और उसके एक दिन बाद धुलेंडी के रूप में मनाया जाता है। होली के इस त्योहार को दो दिन मनाए जाने की पीछे कुछ पौराणिक मान्यताएं हैं।

विष्णु पुराण के अनुसार हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को एक शॉल रूपी वस्त्र वरदान के रूप मिला था। वरदान के अनुसार जब भी होलिका इस शॉल को ओढ़कर आग में बैठेगी तो होलिका पर आग का असर नहीं पड़ेगा और वो जलेगी नहीं।

इस वरदान की वजह से हिरण्यकश्यप ने होली की शुरुआत होलिका की गोद में प्रहलाद को बैठाकर जलाकर मारने से की थी। हिरण्यकश्यप अपने बेटे प्रहलाद से कहता था कि वो " ऊं नमो भगवते वासुदेवाय "का मंत्र ना जपा करे लेकिन प्रहलाद अपने पिता की इस बात को मानने को तैयार नहीं था। इसलिए उसने अपनी बहन के जरिये अपने पुत्र प्रहलाद का अंत करने की साजिश रची थी।

नारायण और सत्य पर यकीन रखने वाले लोग प्रहलाद की जीवन की रक्षा के लिए नारायण से प्रार्थना करते हुए "ऊं नमो भगवते वासुदेवाय " के मंत्र का जाप करते हुये होलिका दहन में शामिल होते हैं। होलिका तो जल जाती है और प्रहलाद "ऊं नमो भगवते वासुदेवाय "का मंत्र का जाप करते हुए जीवित मिलता है।

ऐसे में नारायण और सत्य पर भरोसा रखने वाले लोग खुशी से झूम उठते हैं और गले मिलकर, गुलाल लगााकर प्रहलाद के जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार धुलेंडी मनाते हैं। 
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