ganesh chaturthi 2020: ज्योतिषशास्त्र में अश्विनी आदि सभी नक्षत्रों के अनुसार देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण इन तीनो गणों के ईश गणेश ही हैं
Ganesh Chaturthi 2020: सभी देवों में प्रथम पूजनीय भगवान गणेश को समर्पित गणेशोत्सव 22 अगस्त से आरंभ हो रहा है। 22 अगस्त, शनिवार को गणेश चतुर्थी का पर्व है। हर वर्ष भादों माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि सोमवार को स्वाति नक्षत्र की सिंह लग्न में नारायणास्त्र चक्रसुदर्शन मुहूर्त (अभिजित)में हुआ। उस समय सभी शुभ ग्रह इनकी कुंडली में पंचग्रही योग बनाए थे, बाकी पाप ग्रह अपने कारक भाव में बैठे थे। पंचभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में पृथ्वी शिव, जल गणेश, तेज-अग्नि शक्ति, वायु सूर्य और आकाश विष्णु हैं। इन पांच तत्वों के वगैर जीव-जगत की कल्पना नहीं की जा सकती। जल तत्व के अधिपति गणेश हर जीव में रक्त रूप में विराजते हुए चारों देवों सहित पंचायतन में पूज्य हैं जैसे श्रृष्टि का कोई भी शुभ-अशुभ कार्य जल के बिना पूर्ण नहीं हो सकता वैसे ही गणेश पूजन के बिना कोई भी जप-तप, अनुष्ठान आदि कर्म पूर्ण नहीं होसकता ! ज्योतिषशास्त्र में अश्विनी आदि सभी नक्षत्रों के अनुसार देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण इन तीनो गणों के ईश गणेश ही हैं।
गणेश चतुर्थी 2020 का योग
ज्योतिषशास्त्र की गणना के अनुसार इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर विशेष योग बन रहा है। 22 अगस्त को गणेश चतुर्थी पर सूर्य सिंह राशि में मौजूद रहेगा और मंगल मेष राशि में। ये दोनों ग्रह स्वयं की राशि में होंगे। गणेश चतुर्थी पर सूर्य और मंगल का ऐसा योग दोबारा 126 साल बाद बन रहा है। इस बार गणेशोत्सव चित्रा नक्षत्र में होगा।
प्रतिमा स्थापना का शुभ मुहूर्त
पहला शुभ मुहूर्त- सुबह 7 बजकर 30 से 9 बजे तक।
दूसरा शुभ मुहूर्त- दोपहर 1 बजकर 30 से शाम 4 बजकर 30 बजे तक।
तीसरा शुभ मुहुर्त- शाम 6 बजकर से 7 बजकर 30 तक।
Ganesh Chaturthi 2020: भगवान गणेश की आराधना से दूर होते हैं वास्तुदोष
ज्योतिषशास्त्र में अश्विनी आदि सभी नक्षत्रों के अनुसार देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण इन तीनो गणों के ईश गणेश ही हैं। 'ग' ज्ञानार्थवाचक और 'ण' निर्वाणवाचक है 'ईश' अधिपति हैं अर्थात ज्ञान-निर्वाणवाचक गण के ईश गणेश ही परब्रह्म हैं ! योग-शास्त्रीय साधना में शरीर में मेरुदंड के मध्य जो सुषुम्ना नाडी है, वह ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करके मष्तिष्क के नाडी समूह से मिलजाती है इसका आरम्भ मूलाधार चक्र ही है इसी 'मूलाधार चक्र' को गणेश स्थान कहते हैं। गणेश्वरो विधिर्विष्णु: शिवो जीवो गुरुस्तथा ! षडेते हंसतामेत्य मूलाधारादिषु स्थिताः ! आध्यात्मिक भाव से ये चराचर जगत की आत्मा है सबके स्वामी हैं सबके ह्रदय की बात समझ लेने वाले सर्वज्ञ हैं ! इन्द्रियों के स्वामी होने से भी इन्हें गणेश कहा गया है ! इनका सर हाथी का और वाहन मूषक है ! मूषक का कर्म है चोरी करना, प्राणियों के भीतर छुपे हुए काम, क्रोध मद, लोभादि पापकर्म की जो वृतियाँ हैं उनका प्रतीक है गणेश जी उसपर सवार होकर इन वृतियों को दबाये रहते हैं ! इनके भजन-पूजन से ये विनाशक पापकर्म वृत्तियाँ दबी रहती हैं, जिसके फलस्वरूप जीवात्मा की चिंतन-स्मरण की शक्ति तीक्ष्ण बनी रहती है ! अतः मूषक वाहन का अर्थ अपने भीतर की दुष्ट दुर्वृत्तियों का दमन करना ही है। 'गजमुख' में गज का अर्थ आठ होता है जिसका तात्पर्य है जो आठों दिशाओं की आठों प्रहर रक्षा करता हो- खबर रखता हो वही गजमुख हैं गणेश हैं। ये पाश, अंकुश और वरमुद्रा धारण करते हैं पाश मोह का प्रतीक है जो तमोगुण प्रधान है अंकुश वृत्तियों का प्रतीक है जो रजोगुण प्रधान है वरमुद्रा सत्वगुण का प्रतीक है इनकी उपासना करके प्राणी तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण से ऊपर उठकर इनकी कृपा का पात्र बनता है।