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Dattatreya Jayanti 2021: दत्तात्रेय जयंती आज, जानिए भगवान दत्तात्रेय की पूजा-विधि, कथा और शुभ मुहूर्त

Sat, 18 Dec 2021 10:15 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आज( 18 दिसंबर 2021) को मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा है और इस तिथि को दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है, इस दिन भगवान दत्तात्रेय का अवतरण हुआ था।
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दत्तात्रेय जयंती 2021: र्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने व दर्शन-पूजन करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं - फोटो : pinterest
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विस्तार
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Dattatreya Jayanti 2021: मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा को दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है, इस दिन भगवान दत्तात्रेय का अवतरण हुआ था। आज के दिन त्रिगुण स्वरुप दत्तात्रेय की पूजा का विधान है। भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ। दक्षिण भारत सहित पूरे देश में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं। इस दिन भगवान दत्तात्रेय ( lord Dattatreya) के निमित्त व्रत करने व दर्शन-पूजन करने से जीवन में आई विपत्ति दूर होती हैं,मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
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भगवान दत्तात्रेय पूजा विधि
प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सूर्योदय से पहले स्नान करें और फिर स्वच्छ सात्विक रंग के वस्त्र धारण करें। पूर्व, उत्तर-पूर्व या उत्तर दिशा में चौकी बिछाएं और उसे गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। इसके उपरांत भगवान दत्तात्रेय कि तस्वीर स्थापित करें। अक्षत, रोली, पीला चन्दन, पुष्प,फल आदि से पूजन करें। भगवान को प्रसाद चढ़ाकर धूप-दीप से आरती करें। 

कथा
शास्त्रों के अनुसार महर्षि अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया के पतिव्रत धर्म की चर्चा तीनों लोक में होने लगी। जब नारदजी ने अनुसूया के पतिधर्म की सराहना तीनों देवियों से की तो माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने अनुसूया की परीक्षा लेने की ठान ली। सती अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेवियों के अनुरोध पर तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव पृथ्वी लोक पहुंचे। अत्रि मुनि की अनुपस्थिति में  तीनों देव साधु के भेष में अनुसूया के आश्रम में पहुंचे और माता अनसूया के सम्मुख भोजन करने की इच्छा प्रकट की। देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई। परन्तु तीनों देवताओं ने माता के सामने यह शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराए। इस पर माता को संशय हुआ। इस संकट से निकलने के लिए उन्होंने ध्यान लगाकर जब अपने पति अत्रिमुनि का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए। माता अनसूया ने अत्रिमुनि के कमंडल से जल निकलकर तीनों साधुओं पर छिड़का तो वे छह माह के शिशु बन गए। तब माता ने शर्त के मुताबिक उन्हें भोजन कराया। वहीं बहुत दिन तक पति के वियोग में तीनों देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद मुनि ने उन्हें पृथ्वी लोक का वृत्तांत सुनाया। तीनों देवियां पृथ्वी लोक पहुंचीं और माता अनसूया से क्षमा याचना की। तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। इसके बाद तीनों देवों ने दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया।तीनों देवों को एकसाथ बाल रूप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया।
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शुभ मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि शुरू – 18 दिसंबर, शनिवार सुबह 07.24 से 
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 19 दिसंबर, रविवार सुबह 10.05 तक
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