यह पर्व सूर्य उपासना का प्रमुख पर्व है। यह अकेला ऐसा पर्व है, जिसमें अस्त होते सूर्य की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए सूर्य की पूजा-अर्चना की थी। सूर्य की उपासना का उल्लेख शास्त्रों- पुराणों में मिलता है। मान्यता है कि स्त्रियों के हृदय में इसकी आस्था अपने आप उपजी। पहले यह बिहार से बनारस तक ही मनाया जाता था, लेकिन अब यह समूचे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है।
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इसकी तैयारियां दीपावली से पहले ही शुरू हो जाती हैं। ठेकुआ, सिंदूर, डलिया, सूप, नारियल, गुड़ और चावल की खीर, घीया, भात, चने की दाल की अंतहीन सूची इस माहौल को उत्साह से भर देती है। सूर्यदेव को अर्घ्य देने गंगा किनारे पहुंचने की बेताबी लिए रास्ते में महिला और पुरुषों का समूह आगे बढ़ता है। गंगा के बीच खड़े होकर लोग सूर्य को नमस्कार करते हैं और अर्घ्य देते हैं। यहां कोई पंडित पूजा कराने नहीं आता। पूजा का सारा काम पवनी अर्थात व्रती और पुजारिन ही करती हैें। दिवाली की तीसरी रात से ही गीत सुनाई देने लगते हैं। पवित्रता इतनी की घर मंदिर बन जाता है। इस पर्व में युवा पवनी हो या नब्बे साल की पवनी सभी दुल्हन सी सजती-संवरती हैं। व्रत का दारोमदार पवनी पर ही होता है। दिवाली के छठे दिन तक पूजा का सारा काम पवनी ही करती है।