गाय भारतीय संस्कृति का प्राण है। यह गंगा, गायत्री, गीता, गोवर्धन और गोविंद की तरह पूज्य है। भारत में जन्मे और फले-फूले शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, जैन, बौद्ध, सिख आदि धर्म-संप्रदायों में उपासना, कर्मकांड और मान्यताओं में अंतर होते हुए भी गाय के प्रति आदर भाव है। समवेत भाव व्यक्त करते हुए कहा गया है, "सर्वे देवा: स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौ:।" अर्थात गाय की देह में समस्त देवी-देवताओं का वास है। गाय को निरा पशु न मानकर उसे देवताओं की प्रतिनिधि माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार गाय के मुख में चारों वेद, सींगों में भगवान शंकर और विष्णु रहते हैं।
गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सीगों के अग्र भाग में इंद्र, दोनों कानों में अश्विनी कुमार, नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़, जिह्वा में सरस्वती, अपान में सारे तीर्थ, रोमकूपों में ऋषि, पृष्ठभाग में यम, दक्षिणी पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम में यक्ष गण, मुख के भीतर गंधर्व, नासिका के अग्रभाग में सर्प और खुरों में अप्सराएं हैं। तनाव और प्रदूषण से भरे इस वातावरण में गाय की संभावित भूमिका समझ लेने के बाद गोधन की रक्षा में तत्परता से लगना चाहिए। तभी गोविंद-गोपाल की पूजा सार्थक होगी। गोपाष्टमी का उद्देश्य है, गौ-संवर्धन की ओर ध्यान आकृष्ट करना। त्योहार की प्रासंगिकता इससे और बढ़ी है।