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Akshaya Navami 2020: आंवला नवमी के दिन इस कथा को सुनने से मिलता है अक्षय फल

Mon, 23 Nov 2020 11:55 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
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अक्षय नवमी 2020: आंवला नवमी की कथा - फोटो : सोशल मीडिया
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आज आंवला नवमी है। आंवला नवमी को अक्षय नवमी के नाम से भी जाना जाता है। आज के दिन सहपरिवार आंवले के पेड़ की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को जो कोई आंवले के पेड़ का पूजन परिवार सहित करता है उसे आरोग्य जीवन और सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है। मान्यता के अनुसार, इस दिन किया गया तप, जप, दान इत्यादि व्यक्ति को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त करता है। आंवला नवमी की पूजा के दौरान इससे जुड़ी इस कथा को जरूर पढ़ना या सुनना चाहिए। तभी इस पूजा का अक्षय फल भक्तों को प्राप्त होता है। 

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आंवला नवमी की कथा (Akshaya Navami 2020 Puja Katha in Hindi)
एक राज्य में आंवलया नाम का राजा था। राजा ने यह प्रण लिया था कि वह अपनी प्रजा में रोजाना सवा मन आंवला दान करेगा। उसके बाद ही खाना ग्रहण करेगा। राजा अपने प्रण के अनुसार ऐसा ही करता था। लेकिन उसके बेटे और बहु को यह बात पसंद नहीं थी। इसलिए एक दिन उसके बेटे-बहु ने सोचा कि राजा इतने सारे आंवले रोजाना दान करते हैं, इस प्रकार तो एक दिन सारा खजाना खाली हो जायेगा। एक दिन बेटे ने राजा से कहा की उसे इस तरह दान करना बंद कर देना चाहिए। राजकुमार की बात सुनकर राजा को बहुत दुःख हुआ और राजा ने रानी के साथ महल का त्याग कर दिया।  फिर क्या था, राजा आंवला दान नहीं कर पाए और अपने प्रण के कारण कुछ खाया नहीं। जब भूखे प्यासे सात दिन हो गए तब भगवान को उनके ऊपर दया आ गई।

इसलिए भगवान ने, राजा के लिए जंगल में ही महल, राज्य और बाग-बगीचे सब बना दिए और ढेरों आंवले के पेड़ लगा दिए। जब राजा रानी ने यह देखा कि जंगल में उनके राज्य से भी दोगुना राज्य बसा हुआ है। राजा, रानी से कहने लगे रानी देख कहते हैं, कभी भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। आओ नहा धोकर आंवला दान करें और भोजन करें। राजा-रानी ने आंवले दान करके खाना खाया और खुशी-खुशी नए महल में रहने लगे। उधर आंवला देवता का अपमान करने व माता-पिता से बुरा व्यवहार करने के कारण राजकुमार के बुरे दिन आ गए।
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उसका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया। वह दाने-दाने को मोहताज हो गया और काम ढूंढते हुए अपने पिताजी के राज्य में आ पहुंचा। उसकी हालात इतनी बिगड़ी हुई थी कि पिता ने उन्हें बिना पहचाने हुए काम पर रख लिया। बेटे-बहु सोच भी नहीं सकते कि उनके माता-पिता इतने बड़े राज्य के मालिक भी हो सकते हैं सो उन्होंने भी अपने माता-पिता को नहीं पहचाना। एक-दिन बहु ने सास के बाल गूंथते समय उनकी पीठ पर मस्सा देखा। उसे यह सोचकर रोना आने लगा कि ऐसा मस्सा मेरी सास के भी था। हमने ये सोचकर उन्हें आंवले दान करने से रोका था कि हमारा धन नष्ट हो जाएगा। आज वे लोग न जाने कहां होगे ?

यह सोचकर बहु को रोना आने लगा और आंसू टपक टपक कर सास की पीठ पर गिरने लगे। रानी ने तुरंत पलट कर देखा और पूछा कि, तू क्यों रो रही है? उसने बताया आपकी पीठ जैसा मस्सा मेरी सास की पीठ पर भी था। हमने उन्हें आंवले दान करने से मना कर दिया था इसलिए वे घर छोड़कर कहीं चले गए। तब रानी ने उन्हें पहचान लिया। सारा हाल पूछा और अपना हाल बताया। अपने बेटे-बहू को समझाया कि दान करने से धन कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है। बेटे-बहु भी अब सुख से राजा-रानी के साथ रहने लगे।

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