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Dev uthani ekadashi 2020: जानिए देवउठनी एकादशी पर क्यों तुलसी संग भगवान विष्णु का होता है विवाह?

Mon, 23 Nov 2020 09:22 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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देवउठनी एकादशी 2020
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नवंबर के महीने में कई बड़े त्योहार मनाए जा रहे हैं। करवा चौथ, धनतेरस, दिवाली और छठ पूजा के बाद साल की सबसे महत्वपूर्ण एकादशी मनाई जाएगी। जिसे देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी पर ही भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा के बाद जागते हैं और सृष्टि के संचालन का भार दोबारा से ग्रहण करते हैं। यह एकादशी हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की तिथि पर मनाई जाती है। इस बार देवउठनी एकादशी (Dev uthani ekadashi 2020) बुधवार, 25 नवंबर को है। इस दिन से चतुर्मास भी खत्म हो जाता है और एक बार फिर से विवाह और धार्मिक अनुष्ठान आरंभ हो जाते हैं। मान्यता है कि चार महीने की निद्रा के बाद भगवान विष्णु कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर तुलसी संग विवाह करते हैं। ऐसे में इस तिथि पर हिंदू घरों में तुलसी विवाह का अनुष्ठान किया जाता है। देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह को बहुत ही शुभ माना गया है।
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आखिर हर वर्ष सोते-जागते हैं भगवान विष्णु
भगवान विष्णु के चार महीनों के लिए निद्रा में जाने के पीछे एक कथा है। जिसके अनुसार एक बार भगवान विष्णु से उनकी प्रिया लक्ष्मी जी ने आग्रह भाव में कहा-हे प्रभु!आप दिन-रात जागते हैं लेकिन,जब आप सोते हैं तो फिर कई वर्षों के लिए सो जाते हैं।ऐसे में समस्त प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है।इसलिए आप नियम से ही विश्राम किया कीजिए। आपके ऐसा करने से मुझे भी कुछ समय आराम मिलेगा। लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्कुराए और बोले-'देवी'!तुमने उचित कहा है। मेरे जागने से सभी देवों और खासकर तुम्हें मेरी सेवा में रहने के कारण विश्राम नहीं मिलता है। इसलिए आज से मैं हर वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूँगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और योगनिद्रा कहलाएगी जो मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी रहेगी। इस दौरान जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे,मैं उनके घर तुम्हारे सहित सदैव निवास करूँगा।

भगवान विष्णु संग तुलसी विवाह क्यों 
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राक्षस कुल में एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम वृंदा रखा गया। वह बचपन से भगवान विष्णु की परम भक्त थी और हमेशा उनकी भक्ति में लीन रहती थी। जब वृंदा विवाह योग्य हुई तो उसके माता-पिता ने उसका विवाह समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए जलंधर नाम के राक्षस से कर दिया। वृंदा भगवान विष्णु की भक्त के साथ एक पतिव्रता स्त्री थी जिसके कारण उसका पति जलंधर और भी शक्तिशाली हो गया।
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जलंधर जब भी युद्ध पर जाता वृंदा पूजा अनुष्ठान करती, वृंदा की भक्ति के कारण जलंधर को कोई भी नहीं मार पा रहा था। जलंधर ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी, सारे देवता जलंधर को मारने में असमर्थ हो रहे थे, जलंधर उन्हें बूरी तरह से हरा रहा था। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे।

तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलांधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। 

भगवान को पत्थर का होते देख सभी देवी-देवता में हाकाकार मच गया, फिर माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की तब वृंदा ने जगत कल्याण के लिये अपना शाप वापस ले लिया और खुद जलंधर के साथ सती हो गई फिर उनकी राख से एक पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और खुद के एक रुप को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा। कार्तिक महीने में तो तुलसी जी का शालिग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है।
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