अहोई अष्टमी पूजा विधि
- अहोई अष्टमी के दिन जो माताएं अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं वह सूर्योदय से पहले स्नान आदि से निवृत होकर मंदिर जाएं और व्रत का संकल्प लें।
- धूप, दीप अर्पित करें और फल-फूल चढ़ाएं। अक्षत रोली और दूध अर्पित करें।
- कुछ समुदाय के लोग चांदी की अहोई बनवाते हैं, जिसे स्याऊ कहते हैं और इसकी पूजा कर बाद में दो मोतियों के साथ धागे की मदद से गले में पेंडेंट के रूप में पहनते हैं।
- अहोई माता के साथ सेई की का ध्यान कर माता और सेई को हलवे के साथ सात घास का भोग अर्पित करें।
- पूजा के अंत में माता अहोई की आरती की जाती है।
- फिर तारों या चंद्रमा को करवा या कलश से अर्घ्य दिया जाता है।
अहोई अष्टमी में लगाएं ये भोग
अहोई अष्टमी व्रत में आप अहोई माता को चावल की खीर, मालपुआ, गुलगुले, सिंघाड़े का फल, मूली, दूध, चावल, गेंहू के 7 दाने, मेवा, फल-फूल और जलेबी का भोग लगा सकते हैं।
अहोई अष्टमी की आरती
जय अहोई माता जय अहोई माता । तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।
ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता । जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।
तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता । कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।
जिस घर थारो वास वही में गुण आता । कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।
तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता । खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।
शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता । रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता । उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।