कुल्लू घाटी पर 10 जुलाई को मौसम कहर बनकर टूटा। ब्यास, पार्वती नदी में भयानक बाढ़ से मनाली, पारला भुंतर, मणिकर्ण व सैंज में भारी नुकसान हुआ। कुल्लू में आपदा से 565 घर क्षतिग्रस्त हुए, 2,439 मकानों को आंशिक नुकसान पहुंचा। 559 गोशालाएं, 570 व्यावसायिक परिसर, कृषि व बागवानी योग्य 1850 बीघा भूमि बह गई। कुल्लू से पलचान तक सात जगहों पर 200 से 700 मीटर हाईवे का नामोनिशान मिट गया था।
अब एनएचएआई ने कुल्लू-मनाली तक हाईवे को चकाचक कर दिया है। थुनाग बाजार में तांदी नाला से 9 जुलाई को आई भयंकर बाढ़ ने सैंकड़ों लोगों को बेघर कर दिया था। जिंदगी भर की कमाई से बने आशियाने जमींदोज हो गए। लोगों को रिश्तेदारों के घरों में शरण लेनी पड़ी। थुनाग, छतरी और बागाचनोगी उप तहसील में 69 मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। 161 मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। 42 दुकानें और 102 गोशालाएं बाढ़ की भेंट चढ़ीं। सिराज घाटी में सात लोगों की दर्दनाक मौत हो गई।
राजधानी शिमला के समरहिल क्षेत्र में शिव बावड़ी मंदिर में 14 अगस्त को हुई त्रासदी में 20 लोग काल का ग्रास बने। 11 दिनों तक मलबे से शवों को बाहर निकालने का अभियान चला रहा। एडवांस्ड स्टडी के नीचे कालका-शिमला हेरिटेज रेल लाइन का पुल भी इस त्रासदी की भेंट चढ़ा। इस कारण करीब दो महीने ट्रेनों की आवाजाही बंद रही।
कालका-शिमला नेशनल हाईवे पांच भूस्खलन के कारण चक्कीमोड़ के पास बंद होने से लोगों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई। पैदल गुजरने के लिए भी लोगों को दो किलोमीटर का सफर तय करना पड़ा। पंजाब और चंडीगढ़ से दूध की सप्लाई प्रभावित हुई। सीजन के दौरान बाहरी राज्यों की मंडियों तक सेब पहुंचाना मुश्किल हो गया। तेल के टैंकर और ट्रक कई दिनों तक फंसे रहे।
भारी बारिश से भूस्खलन के कारण शिमला, मंडी और कुल्लू जिलों में सेब के बगीचों को भारी नुकसान हुआ। सेब के हजारों फलदार पौधे उखड़ गए। शिमला जिले के कुमारसैन में ही 1500 से अधिक पौधे उखड़ गए। ठियोग, कोटखाई, जुब्बल, रोहड़ू और चिड़गांव में भी सेब के हजारों पौधे क्षतिग्रस्त हुए।
उपमंडल पांवटा साहिब के सिरमौरी ताल में 9 अगस्त की रात बादल फटने से एक परिवार के पांच सदस्यों की मलबे में दबकर मौत हो गई। हादसे में दादा, दादी, पोती, पोते और बहू की मौत हुई थी। छह सदस्यों के परिवार में सिर्फ बेटा बचा, जो घटना के समय घर से कुछ दूरी पर था।