वहीं दूसरे प्रकार के उपचार में गुर्दा प्रत्यारोपण किया जाता है, जोकि सबसे बेहतर विकल्प है। गुर्दा प्रत्यारोपण में स्वस्थ व्यक्ति का गुर्दा मरीज को लगाया जाता है। यह जीवित दाता (परिवार के सदस्य या दोस्त) या मृतक दाता (अंग दान करने वाला) से प्राप्त किया जा सकता है। गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद डायलिसिस की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। मरीज की ऊर्जा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। लंबी अवधि में मृत्यु का जोखिम कम होता है। लेकिन इसके साथ ही इसकी कुछ चुनौतियां भी हैं। इनमें मरीजों को प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त दाता मिलना कठिन होता है। मरीज को जीवन भर इम्यूनो सप्रेसेंट दवाइयां लेनी पड़ती हैं। सर्जरी से जुड़ी जटिलताएं और संभावित जोखिम रहते हैं।
अंग दान की जरूरत और जागरूकता
डॉ. संजय विक्रांत ने कहा कि भारत में 80 फीसदी से अधिक गुर्दा प्रत्यारोपण जीवित दाताओं से होते हैं, जबकि मृतक दान बहुत कम होता है। इसके चलते हजारों मरीजों को समय पर गुर्दा नहीं मिल पाता और उनकी जान चली जाती है। यदि अधिक लोग मृत्यु उपरांत अंग दान के लिए आगे आएं, तो यह अंतर कम किया जा सकता है। उन्होंने अपील की कि इस विश्व गुर्दा दिवस पर संकल्प लें कि हम अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाएंगे और अधिक से अधिक लोगों को इस नेक कार्य के लिए प्रेरित करेंगे।
सरकार और समाज की भूमिका
भारत सरकार राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन के माध्यम से अंग दान को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रही है। इसके तहत मृतक अंग दान को प्रोत्साहित करने, अस्पतालों में प्रत्यारोपण सुविधाओं का विस्तार करने और लोगों को जागरूक करने की दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं।
शुगर, उच्च रक्तचाप किडनी के लिए खतरा
हिमाचल प्रदेश में किडनी रोग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। खासकर डायबिटीज और उच्च रक्तचाप के कारण इनकी संख्या में बढ़ोतरी हुई है। हिमाचल में डायबिटीज की प्रचलन दर 11.5 फीसदी है। जोकि राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी से अधिक है। पुरुषों में यह दर 11.6 फीसदी और महिलाओं में 11.4 फीसदी पाई गई है। आईसीएमआर-इंडिया डायबिटीज अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। शोध में यह भी सामने आया है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 35.89 फीसदी लोग उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं। वहीं 21.98 फीसदी लोग ही इसकी जानकारी रखते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में बढ़ते डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मामलों के मद्देनजर, किडनी रोग के बढ़ते संकट को नियंत्रित करने के लिए विशेष कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। आईजीएमसी के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के सहायक प्रो. डॉ. अमित सचदेवा ने बताया कि किडनी रोग के प्रमुख जोखिम कारकों में डायविटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और पर्यावरणीय कारक भी शामिल हैं।
भारत में 17 फीसदी जनसंख्या किडनी रोग से प्रभावित
उन्होंने बताया कि किडनी रोग से जागरुकता से ही बचा जा सकता है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2017 के अनुसार भारत में किडनी रोग मृत्यु का आठवां प्रमुख कारण बन चुका है। यह 19.2 प्रति एक लाख आबादी है।
भारत में किडनी रोग का बोझ लगातार बढ़ रहा है। शोध बताते हैं कि भारत में लगभग 17 फीसदी जनसंख्या किसी न किसी रूप में किडनी रोग से प्रभावित है। भारतीय सीकेडी रजिस्टर के अनुसार 31 फीसदी मामलों में डायबिटी नेफ्रोपैथी प्रमुख कारण है। आईजीएमसी के मेडिसिन विभाग के सहायक प्रो. डॉ. उष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि मरीज नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं। खासकर अगर परिवार में किडनी रोग का इतिहास हो। इसके अलावा रक्तचाप और शुगर को नियंत्रित रखें। संतुलित आहार खाएं, जिसमें कि कम नमक हो। इसके अलावा नियमित व्यायाम करें और धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें।