अब कांगड़ा में वीरभद्र गुट के नेताओं ने प्रस्तावित सम्मेलन में विरोधी खेमे के नेताओं को न बुलाकर ये साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में उनकी यह मुहिम और तेजी पकड़ सकती है। सारी स्थिति भांपते हुए सुक्खू शिमला से रजनी पाटिल के लौटने से पहले ही दिल्ली चले गए हैं।
सुक्खू हाईकमान से लोकसभा चुनाव से पहले भी उसी तरह का अभयदान मांग सकते हैं, जैसा कि उन्हें विधानसभा चुनाव से पहले मिला था। पर बुरी तरह से विधानसभा चुनाव में हारी कांग्रेस के बारे में हाईकमान की ताजा राय रजनी पाटिल की रिपोर्ट के बाद आने वाले दिनों में ही साफ होगी। इसमें भी वीरभद्र खेमा अपना पूरा दखल देने को प्रयास करेगा।
साथ-साथ चल रहे सुक्खू और कौल सिंह की वीरभद्र गुट के खिलाफ जंग आसान नहीं है। छात्र राजनीति के रास्ते सुक्खू को राज्य की राजनीति में लाने वाले पंडित सुखराम और विद्या स्टोक्स कांग्रेस की सियासत से लगभग किनारा कर चुके हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कौल सिंह बेशक सुक्खू के साथ जरूर हैं, मगर उनकी पार्टी में पूर्व अध्यक्ष और पूर्व मंत्री से अधिक की हैसियत नहीं है।