देशी आहार की पोषण क्षमता और आयुष परंपराओं का होगा वैज्ञानिक मूल्यांकन
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अब लाहौल-स्पीति और किन्नौर के जनजातीय समुदायों की पारंपरिक खाद्य प्रणालियों का वैज्ञानिक अध्ययन करेगा। विश्वविद्यालय के रामानुजन भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं भारतीय गणित केंद्र में इस संबंध में नई शोध परियोजना शुरू की जा रही है। परियोजना को शिक्षा मंत्रालय के भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रभाग से वित्तीय सहायता मिली है।
शोध का केंद्र इन क्षेत्रों में प्रचलित देशज आहार रहेगा। अध्ययन में पारंपरिक भोजन के पोषण संबंधी गुणों का आकलन किया जाएगा। साथ ही आयुष आधारित दृष्टिकोण से इनके स्वास्थ्य और पोषण संबंधी महत्व को समझने का प्रयास होगा। परियोजना का उद्देश्य केवल पारंपरिक व्यंजनों का दस्तावेजीकरण करना नहीं है। इसमें यह जानने का प्रयास होगा कि जनजातीय समुदायों की पारंपरिक खाद्य प्रणालियां कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में पोषण सुरक्षा बनाए रखने में कितनी सक्षम हैं। स्थानीय खाद्य संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और भोजन संबंधी प्रथाओं का अध्ययन भी शोध का हिस्सा रहेगा।
शोध परियोजना को भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रतिस्पर्धी शोध प्रस्ताव कार्यक्रम के तहत मंजूरी मिली है। परियोजना का नाम परंपरा से व्यवहार है। इसमें लाहौल-स्पीति और किन्नौर के जनजातीय समुदायों के देशज आहार की पोषण क्षमता का अध्ययन किया जाएगा। विश्वविद्यालय के अनुसार, शोध से हिमाचल की पारंपरिक खाद्य विरासत को वैज्ञानिक आधार मिलने की संभावना है। इसके निष्कर्ष स्थानीय खाद्य संसाधनों के संरक्षण और उनके बेहतर उपयोग में उपयोगी हो सकते हैं। साथ ही पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध से जोड़ने में मदद मिलेगी।
परियोजना के लिए क्षेत्रीय स्तर पर आंकड़े और सूचनाएं जुटाई जाएंगी। इसके लिए परियोजना सहायक और क्षेत्र अन्वेषकों की नियुक्ति की जाएगी। शोध का नेतृत्व रामानुजन भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं भारतीय गणित केंद्र के प्रधान अन्वेषक प्रो. जोगिंदर सिंह धीमान करेंगे। परियोजना से जुड़े पदों के लिए आवेदन कर चुके अभ्यर्थियों का साक्षात्कार 26 अगस्त को होगा। साक्षात्कार पूर्वाह्न 11 बजे गणित एवं सांख्यिकी विभाग स्थित केंद्र में आयोजित किया जाएगा। शोध में क्षेत्रीय खाद्य परंपराओं की वास्तविक स्थिति और उनके पोषण महत्व को प्रमुखता दी जाएगी।