50 मीटर लंबी सुरंग का 90 फीसदी कार्य पूरा, जनवरी में मिलेंगे दोनो छोर
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। ढली-कैथलीघाट फोरलेन परियोजना के अंतर्गत ढली से लंबीधार तक 150 मीटर लंबी सुरंग का निर्माण कार्य लगभग पूरा होने को है। इसका 90 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है और जनवरी तक इस टनल के दोनों छोर मिलने की उम्मीद है। यह सुरंग शिमला की भीड़भाड़ को कम करने में मददगार साबित होगी और यातायात को सुगम बनाएगी। टनल बन जाने के बाद ढली की ओर जाने वाले वाहनों के लिए एक सीधा रास्ता उपलब्ध होगा, जिससे शहरी क्षेत्र में जाम की समस्या से राहत मिलेगी। इस परियोजना पर लगभग 40 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
यह टनल 3,970 करोड़ रुपये की लागत से बन रही शिमला-चंडीगढ़ फोरलेन परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य शिमला और आसपास के क्षेत्रों में यात्रा को तेज और सुविधाजनक बनाना है। ढली से लंबीधार तक इस सुरंग के निर्माण के लिए पहले ही पहाड़ों पर कटिंग और स्टेबलाइजेशन का कार्य पूरा कर लिया गया है। शेष 10 प्रतिशत कार्य को जनवरी तक समाप्त करने का लक्ष्य है। इस सुरंग के पूरा होने से शिमला के विभिन्न हिस्सों को फोरलेन के माध्यम से जोड़ा जा सकेगा, जिससे यातायात सुगमता में सुधार होगा।
निर्माण कार्य में सभी पर्यावरणीय और तकनीकी मानकों का सख्ती से पालन किया जा रहा है। परियोजना में सैकड़ों मजदूर और आधुनिक मशीनें तैनात हैं, जो दिनरात काम कर रही हैं। इस सुरंग के बनने से स्थानीय निवासियों और यात्रियों को उम्मीद है कि शहर में यात्रा करना आसान होगा और प्रमुख मार्गों पर ट्रैफिक का दबाव घटेगा। इसके अतिरिक्त सुरंग के भीतर वेंटिलेशन सिस्टम स्थापित किया जाएगा ताकि अंदर की हवा ताजी बनी रहे।
यह सुरंग शिमला-चंडीगढ़ मार्ग को आसान बनाने में एक अहम भूमिका निभाएगी। इसके निर्माण के बाद इस मार्ग पर यातायात में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा। परियोजना के अंतर्गत शिमला की पहाड़ियों में कुल 10 सुरंगों का निर्माण होना है, जिनमें से यह एक प्रमुख सुरंग है। इस टनल के माध्यम से शहर के भीतर और बाहर यात्रा करना आसान होगा। शिमला के मुख्य मार्गों पर जाम की समस्या में भी कमी आएगी।
कोट्स
सुरंग का 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और बाकी हिस्से में तेजी से कार्य चल रहा है। खोदाई के लिए उन्नत तकनीक और आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, तो जनवरी तक टनल के दोनों छोर मिल जाएंगे।
-योगेश कुमार, साइट इंजीनियर, एनएचएआई