शरीर की वैरिकोज नसों के उपचार के लिए अब प्रदेश के लोगों को बाहरी राज्यों के स्वास्थ्य संस्थानों का रुख नहीं करना पड़ेेगा। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान बिलासपुर के रेडियोलॉजी विभाग ने वैरिकोज नसों का एंडोवस्कुलर उपचार शुरू कर दिया है। एम्स बिलासपुर में 29 नवंबर को दो रोगियों का अल्ट्रासाउंड गाइडेड एंडोवस्कुलर ग्लू एंबोलाइजेशन किया गया। एम्स के डॉ. कर्मवीर चंदेल, डॉ. लोकेश राणा और डॉ. प्रतीक सिहाग की रेडियोलॉजी टीम ने प्रक्रिया को पूरा किया। मरीजों को प्लास्टिक सर्जन डॉ. नवनीत शर्मा की देखरेख में भर्ती कराया गया था। डॉ. कर्मवीर चंदेल ने बताया वैरिकोज वेन्स, जिसे वैरिकोजिटीज के रूप में भी जाना जाता है, ये एनगॉर्जड टेढ़ी-मेढ़ी नसें हैं, जो आमतौर पर पैरों में पाई जाती हैं।
वैरिकोज नसें उन व्यक्तियों में अधिक पाई जाती हैं, जिनकी दैनिक गतिविधियों में लंबे समय तक खड़े रहना शामिल होता है। लंबे समय तक खड़े रहने से पैरों की नसों में रक्त जमा हो सकता है, जिससे नसों के अंदर दबाव बढ़ जाता है। बढ़ा हुआ दबाव नसों के वाल्वों को नुकसान पहुंचा सकता है और वैरिकोसिटी का कारण बन सकता है। प्लास्टिक सर्जन डॉ. नवनीत शर्मा ने बताया कि बीमारी के दौरान रोगियों को पैरों में हल्का दर्द और भारीपन महसूस हो सकता है, चाहे वह छोटी नसों के साथ या बिना हो। डॉ. कर्मवीर चंदेल ने बताया कि ओपीडी में बड़ी संख्या में वैरिकोज वेन्स के मरीज आ रहे थे। इसके इलाज के लिए मरीजों को पीजीआई या पड़ोसी राज्यों के निजी अस्पतालों में जाना पड़ता था।