गुड़िया दुराचार और हत्या मामले से जुडे़ लॉकअप हत्याकांड पर क्या सीबीआई को खुद ही भरोसा नहीं है? ये सवाल खुद सीबीआई के एक बयान पर खड़ा हुआ है। सीबीआई ने आम लोगों से अपील की है कि जब तब अपराध साबित नहीं हो जाता है, तब तक आरोपियों को निर्दोष माना जाए।
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केंद्रीय जांच ब्यूरो ने शनिवार को गुड़िया दुराचार और हत्या मामले का चालान कोर्ट में पेश किया। इसके बाद शाम के वक्त एक प्रेस नोट जारी कर इसकी आधिकारिक सूचना दी। प्रेस नोट में नीचे सीबीआई ने लिखा कि जांच अभी जारी है।
इसके बाद इटेलिक शब्दों में सीबीआई ने अपील की कि पब्लिक को याद करवाया जाता है कि उपरोक्त फाइंडिंग्स इकट्ठा किए गए सबूतों और इन पर की गई छानबीन पर ही आधारित हैं।
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भारतीय कानून के तहत आरोपियों को तब तक निर्दोष ही माना जाता है, जब तक एक निष्पक्ष मुकदमे के बाद उनके खिलाफ अपराध साबित न हो जाए।
डीडब्ल्यू नेगी बोले- मेरे तमाम आधुनिक टेस्ट करवा लो
शिमला के पूर्व एसपी डीडब्ल्यू नेगी ने कोर्ट को लिखकर दिया है कि उनके जो मर्जी टेस्ट करवा लिए जाएं, वे जांच में सहयोग को तैयार हैं। नार्को, ब्रेन मैपिंग, लाई डिटेक्टर जैसे टेस्ट करवाने को तैयार हैं।
सूत्रों ने बताया कि नेगी ने सीबीआई को भी बयान दिया है कि ये सही है कि लॉकअप में मौत के बाद डीएसपी मनोज जोशी उनसे शिमला में मिले, मगर उन्हें यही तथ्य बताया गया कि राजू ने ही सूरज को मारा।
चूंकि वे एसआईटी की जांच टीम में उस वक्त छानबीन शामिल नहीं थे, इसलिए उन्हें अधीनस्थ अधिकारी की ये सूचना सही लगी। ये बात आईजी और डीजीपी दोनों के ही ध्यान में लाए जाने के बाद मामला दर्ज हुआ।
अब आगे क्या होगा
सीजेएम कोर्ट ने सात दिसंबर 2017 की तारीख को आरोपियों को चालान की प्रति देने के लिए मुकर्रर किया गया है। आरोपियों को सात दिसंबर तक ही न्यायिक हिरासत पर भी भेजा गया है।
मामले में अगली कार्रवाई सात दिसंबर को होगी। उसके बाद इस मामले की सुनवाई और बहस शुरू होगी। सूत्रों ने बताया कि ट्रायल के लिए ये केस सत्र न्यायाधीश की अदालत को भी जा सकता है, सीबीआई मामलों की सुनवाई सत्र न्यायाधीश की अदालत में ही होती है।
लॉकअप मामले में सीबीआई ने लगाई ये धाराएं
120 बी : आपराधिक षड्यंत्र रचना।
302 : हत्या
330 : कुछ कबूल करवाने को प्रताडि़त करना।
331 : कुछ कबूल करवाने को गंभीरता से प्रताडि़त करना।
348 : गलत तरीके से किसी बात को कबूल करने को मजबूर करना।
323 : मनमर्जी से किसी को प्रताडि़त करना।
326 : किसी खतरनाक हथियार या माध्यम से मारना।
218 : पब्लिक सर्वेंट ने गलत रिकॉर्ड तैयार किया और किसी व्यक्ति को सजा होने से बचाया।
195 : किसी को सजा से बचाने के इरादे से झूठे सबूतों को तैयार करना।
196 : उस सबूत को काम में लाना, जिसका मिथ्या होना ज्ञात है।
201 : अपराध के साक्ष्य का विलोपन या अपराधी पर परदा डालने के लिए झूठी सूचना देना।
गुड़िया के असली गुनहगारों पर सीबीआई ने सिले होंठ
बेशक लॉकअप हत्याकांड की गुत्थी को सीबीआई ने लगभग सुलझा देने का दावा किया हो, लेकिन गुड़िया के असली गुनहगारों पर देश की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी ने अपने होंठ सिल लिए हैं। आलम यह है कि सीबीआई इस मामले में एक भी शब्द बोलने को तैयार नहीं है।
सीबीआई अपनी अब तक की जांच में गुड़िया के कातिलों और दुराचारियों को सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा पाई है। प्रदेश की जनता की नजरें अब इसी पर टिकी हैं कि कब सीबीआई अपराधियों के गिरेबान तक पहुंचेगी।
हिमाचल पुलिस ने जिन छह आरोपियों को गुड़िया दुराचार और हत्या मामले में पकड़ा था, उनमें से एक आरोपी नेपाली सूरज सिंह को पुलिस हिरासत में ही मार दिया गया। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक उसे मारने वालों में एसआईटी में शामिल रहे पुलिसवालों का ही हाथ रहा।
तो असल मुजरिम कौन
बाकी पांच आरोपियों में राजू, दीपक, लोकजन, सुभाष और सह आरोपी आशीष चौहान जमानत पर रिहा हो चुके हैं। सीबीआई ने अभी तक इस बात से परदा नहीं उठाया है कि जो पुलिस ने इस मामले में आरोपी बनाए, वे सीबीआई की नजर में आरोपी हैं कि नहीं?
अगर इनका इस केस में कोई रोल नहीं था तो क्या पुलिस की कहानी इस असल मामले में भी झूठी ही थी? अगर पुलिस ने गुड़िया मामले में भी झूठा केस बनाया तो असल मुजरिम कौन हैं?
अभी तक इस जघन्य अपराध के बाद सड़कों पर उतरने वाली जनता को इसका कोई जवाब नहीं मिला है। सीबीआई की पूरी जांच हिमाचल हाईकोर्ट की लगातार निगरानी में हो रही है।
अब तक कोर्ट को कई स्टेटस रिपोर्ट दे चुकी सीबीआई को 20 दिसंबर को अपनी अगली रिपोर्ट सौंपनी होगी। आगामी दिनों में अब देखना ये होगा कि सीबीआई की जांच में क्या नई बातें सामने आती हैं?
छह जुलाई को कोटखाई के दांदी जंगल में हलाइला गांव के पास दसवीं की छात्रा गुड़िया (काल्पनिक नाम) की लाश निर्वस्त्र अवस्था में गिरी पड़ी थी। गुड़िया चार जुलाई को यहां एक स्कूल से जंगल के रास्ते अपने घर के लिए निकली, जिसके बाद पांच जुलाई तक जब वह घर नहीं पहुंची तो उसके परिजन उसे जंगल में खोजते रहे। उन्हें लगा कि हो न हो, जंगल में भालू या चीते न उस पर हमला बोला हो।
जब परिजनों को छह जुलाई को उसकी लाश मिली तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद उसके साथ दुराचार अथवा गैंगरेप और हत्या होने की पुष्टि हुई। पुलिस ने कोटखाई थाने में उसकी हत्या और उससे दुराचार होने का मामला दर्ज किया। जनता के आक्रोश के बाद हिमाचल सरकार ने आईजी जैदी के नेतृत्व में पुलिस एसआईटी का गठन किया।
एसआईटी ने कुछ दिन बाद ही छह आरोपियों को पकड़कर ये दावा किया कि इन्हीं ने इस अपराध के अंजाम दिया। जनता ने पुलिस की इस जांच पर संदेह जताते हुए सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए।
18 जुलाई की रात को कोटखाई थाने में पुलिस हिरासत में आरोपी सूरज सिंह की हत्या की गई तो गुस्साए लोगों ने इस थाने को ही फूंक डाला। इसके बाद हिमाचल हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए इस मामले की छानबीन सीबीआई को दी। सीबीआई ने इस मामले की जांच जुलाई अंत में शुरू की।