वह बैंकों में जमा पर लाखों रुपये टैक्स देते हैं। चौहान ने बताया कि 1981 से लेकर 1997 तक उन्होंने महाराष्ट्र में संतरा कारोबारी के साथ कमीशन एजेंट के रूप में काम शुरू किया। इस काम से गुजारा भर होता था। 1997 में सब छोड़कर अपने गांव लौटे। उनके सात भाई होने के कारण हिस्से में 10 बीघा जमीन ही आई।
उन्होंने पुरानी किस्मों के कम पैदावार करने वाले सेब के पेड़ काटकर इनके ऊपर हाई कलर किस्मों की टॉप ग्राफ्टिंग की। मार्केटिंग का अनुभव पहले से ही था। सेब बगीचे में बड वुड बैंक भी बनाया। ग्राफ्टिंग के लिए लोग उनसे बडवुड खरीदकर ले जाने लगे। सैकड़ों पुरस्कार पा चुके चौहान को हरित क्रांति के जनक एमएस स्वामीनाथन वर्ष 2011 में फार्मर ऑफ द ईयर्स अवार्ड दे चुके हैं।
उन्हें जमशेदजी टाटा फेलोशिप भी मिली है। चौहान सेब और नाशपाती की दर्जनों किस्मों पर काम कर रहे हैं। लगभग 50 बीघा में की जा रही सेब बागवानी में उनके भाई मोतीलाल चौहान भी सहायता करते हैं। रामलाल यूएसए की वैनवैल नर्सरी में एक सप्ताह का प्रशिक्षण ले चुके हैं। अमेरिका, चीन, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी समेत एक दर्जन देशों में सेब बागवानी की आधुनिक तकनीक सीख चुके हैं।