मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण के सचिव को वन विभाग के आला अधिकारियों और नगर निगम शिमला के कमिश्नर के साथ मिलकर विवादित स्थल का संयुक्त निरीक्षण करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट में यह स्पष्ट करें कि क्या इस पांच और छह मंजिला इमारत और सड़क के निर्माण के लिए नगर निगम से कोई वैध मंजूरी ली गई थी या नहीं। यह भी जांच की जाए कि जमीन की मूल प्रकृति क्या है और क्या यह वन भूमि का हिस्सा है। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि निरीक्षण के दौरान निर्माण से जुड़ी आवश्यक मंजूरियां और स्वीकृतियां नहीं पाई जाती हैं, तो तुरंत प्रभाव से सारा निर्माण कार्य रोकने के आदेश जारी किए जाएं।अगली सुनवाई 14 सितंबर को होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को सौंपे गए दस्तावेजों और गूगल मैप्स के तुलनात्मक रिकॉर्ड से खुलासा हुआ कि वर्ष 2015 से 2019 के दौरान यह पूरा इलाका पूरी तरह से एक ग्रीन बेल्ट (हरियाली क्षेत्र) था। वर्ष 2025 के गूगल मैप और हालिया तस्वीरों में यहां दो बड़ी-बड़ी इमारतों का ढांचा खड़ा दिखाई दे रहा है। कोर्ट में पेश की गई तस्वीरों से साफ हुआ है कि लोअर चक्कर-टूटू रोड से इस निर्माण स्थल तक एक अवैध सड़क का निर्माण किया गया है। इस प्रक्रिया में कई हरे पेड़ों को बेरहमी से काटा गया और बड़े पैमाने पर जंगलों में मलबे की डंपिंग की गई। इस मलबे का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक कार्ट रोड तक पहुंच गया है। अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि जिस तरह सड़क पर पेड़ों को असुरक्षित छोड़ दिया गया है, वे आने वाले समय में सबसे पहले जमींदोज होंगे।