शिमला के रिज मैदान के नीचे स्थित 140 साल पुराना जलाशय और ब्रिटिशकालीन जलापूर्ति व्यवस्था।
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आधुनिक तकनीक और डिजिटाइजेशन के दौर में भी हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की पेयजल व्यवस्था आज तक ब्रिटिशकाल की इंजीनियरिंग पर टिकी हुई है। करीब 140 साल पहले अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई जलापूर्ति प्रणाली आज भी शहर के हजारों लोगों की प्यास बुझा रही है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस व्यवस्था के वॉल्व आज भी चार से 12 किलो वजनी लोहे की विशेष चाबियों से खोले और बंद किए जाते हैं।
ऐतिहासिक रिज मैदान के नीचे स्थित 45 लाख लीटर क्षमता वाला पानी का टैंक आज भी शहर की जलापूर्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसी टैंक से मालरोड और शहर के कोर एरिया तक छह इंच से 16 इंच व्यास वाली मुख्य पेयजल पाइपलाइनें बिछाई गई थीं, जिनसे आज भी पानी की आपूर्ति की जा रही है।
इन पाइपलाइनों में लगे वॉल्व को संचालित करने के लिए अंग्रेजों ने विशेष डिजाइन की भारी लोहे की चाबियां तैयार करवाई थीं। इनका वजन चार से 12 किलो तक है और एक ही चाबी का उपयोग छह से 12 इंच तक की विभिन्न पाइपलाइनों के वॉल्व खोलने और बंद करने में किया जा सकता है। इनमें से कई चाबियां ब्रिटिशकाल की मूल चाबियां हैं, जबकि कुछ नई तैयार कराई गई हैं। एक समय शहर के कोर एरिया में आम लोगों को पानी उपलब्ध कराने वाले ब्रिटिशकाल के शेरनुमा सार्वजनिक नल भी इस व्यवस्था का हिस्सा थे, लेकिन समय के साथ अब ये विरासत धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।