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Shimla News: फर्जी खरीद मामले में फंसे एसडीओ और चार जेई, 18 दिसंबर को तय होंगे आरोप

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कोर्ट में चल रहे 16 साल पुराने धांधली के मामले में तत्कालीन अधिकारियों समेत 10 आरोपियों की अर्जियां खारिज
क्रॉसर
1.94 करोड़ रुपये की कथित फर्जी खरीद का है मामला
2009 में दर्ज हुई थी एफआईआर, तीन चार्जशीट दाखिल
विजिलेंस की जांच पर कोर्ट का तर्क, पर्याप्त साक्ष्य मौजूद
दीपक मेहता
शिमला। जल शक्ति विभाग (आईपीएच) शिमला सर्किल में वर्ष 2003 से 2006 के बीच हुई करीब 1.94 करोड़ की कथित फर्जी खरीद और अनियमित खर्चों के चर्चित मामले में अब सभी दस आरोपी अधिकारियों पर कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।
इनमें से कई आरोपी वर्तमान में कई बड़े ओहदों पर तैनात हैं। यह मामला 16 साल पुराना है, उस वक्त आरोपी एसडीओ, जेई के पदों पर तैनात थे। स्पेशल जज (फॉरेस्ट) कोर्ट ने सभी आरोपियों की डिस्चार्ज (मुक्ति) याचिकाएं खारिज करते हुए कहा है कि रिकॉर्ड में आरोप तय करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। अब 18 दिसंबर 2025 को आरोप तय किए जाएंगे। चालान नंबर-1, 2 और 3 की सुनवाई में आरोपी एसपी लोहिया, प्रकाश चंद, रूप लाल, विशाल जमवाल और विश्वनाथ अदालत में पेश हुए। वहीं गुरचरण सिंह, नरेंद्र कपूर, जयपाल सिंह, सोहन सिंह और रविंदर पाल बक्शी अनुपस्थित रहे। अदालत ने उनकी छूट याचिकाएं स्वीकार कर लीं। मैकेनिकल डिवीजन नंबर दो में करीब दो दशक पुराने इस वित्तीय घोटाले में विजिलेंस ने वर्ष 2009 में एफआईआर दर्ज की थी। लंबी जांच के बाद दिसंबर 2020 में विभाग के तत्कालीन एक्सईएन, एसडीओ, चार जूनियर इंजीनियर सहित चार निजी सप्लायरों के खिलाफ तीन अलग-अलग चार्जशीट अदालत में दायर की गई।
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जांच में सामने आया कि विभाग ने नियमों को दरकिनार करते हुए बिना निविदा (टेंडर) करोड़ों रुपये की खरीद दिखाई। कई मामलों में एक ही दिन टेंडर फाइनल, सप्लाई ऑर्डर, सामग्री की प्राप्ति और भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया निपटा दी गई। बिना निविदा, बिना कार्य आदेश और बिना एग्रीमेंट के कार्य करवाने के भी आरोप हैं। फर्जी रिकॉर्ड तैयार कर नियमों से हटकर भुगतान किए गए। उधर अभियुक्तों ने दलील दी कि कुछ अधिकारी एफआईआर में तो नामजद थे लेकिन चार्जशीट में नहीं हैं। डिविजनल अकाउंटेंट और अकाउंट ऑफिसर की भूमिका की जांच नहीं की गई। इसलिए जांच अधूरी है। हालांकि अदालत ने इन तर्कों को खारिज कर दिया और कहा कि मामला प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि आपराधिक गतिविधि का प्रथम दृष्टया संकेत देता है। इस आधार पर सभी आरोपियों की डिस्चार्ज याचिकाएं खारिज कर दी गईं। अभियोजन ने कहा कि चालान में सभी आवश्यक गवाहों को शामिल कर दिया है।
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फर्जी फर्मों से खरीद का भी खुलासा
विजिलेंस जांच में पाया गया कि डिवीजन समेत धार, चेरेट, गुम्मा एक और गुम्मा दो सब डिवीजन में फर्जी प्रविष्टियां, मनमाने रेट, कोटेशन में हेरफेर और अधिकार सीमा से अधिक खर्च किए गए। पंपिंग स्टेशनों की मरम्मत और फर्नीचर सामग्री पर प्रतिबंध के बावजूद गलत मद में खर्चे दिखाए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई सामान ऐसी फर्मों से खरीदे दिखाए गए जो अस्तित्व में ही नहीं थीं। दस्तावेजों की एफएसएल जांच करवाई गई और दर्जनों गवाहों के बयान लिए गए। इसके बाद सक्षम प्राधिकारी से अभियोजन स्वीकृति लेने के बाद चार्जशीटें कोर्ट में पेश की गईं।
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