चमेरा परियोजना में चोर दरवाजे से करीब 400 लोगों को रोजगार मिलने का पर्दाफाश हुआ है। जिन लोगों को रोजगार मिला है, वे कभी विस्थापित ही नहीं हुए। यह खुलासा सूचना अधिकार के तहत एकत्रित जानकारी के माध्यम से चमेरा विस्थापितों ने किया है। इस मुद्दे पर मंगलवार को विस्थापितों की उपायुक्त सुदेश मोख्टा के साथ बैठक भी हुई।
इसके बाद उपायुक्त ने इस मसले को सरकार के समक्ष रखने का आश्वासन दिया है। बैठक में विस्थापितों ने आरोप लगाया कि चमेरा चरण एक का काम 1981 में शुरू हुआ और 1994 तक चला। इस दौरान 1422 परिवारों की भू संपत्तियों का अधिग्रहण किया गया। 400 लोगों को बिना जिलाधीश की अनुमति के पिछले दरवाजे से नौकरी दे दी गई।
राजनीतिक पहुंच रखने वालों को मिली नौकरी
उपायुक्त सुदेश मोख्टा
- फोटो : File Photo
जिन्हें नौकरी मिली वे न तो विस्थापित थे और न ही परियोजना प्रभावित। इसके बाद 192 राजनीतिक पहुंच रखने वालों को नौकरी दी गई। दस जुलाई 1993 को मोहल, चकलू, पलेही, टिपरी, मनहोता, धड़ी, राजनगर, गती, मुलाण और भनौता गांवों में पानी भर दिया गया। आधी रात को हुई इस घटना में लोग जान बचाने को रस्सी के सहारे और लालटेन लेकर घरों से भागने को मजबूर हुए।
विस्थापितों को नहीं मिल रहा न्याय: ठाकुर
चमेरा विस्थापित प्रभावित परिवार कल्याण समिति के अध्यक्ष चमन सिंह ठाकुर ने बताया कि इस मुद्दे को कई बार सरकार, प्रशासन और अन्य मौकों पर उठाया जा चुका है, लेकिन समाधान नहीं हो पाया है। उन्होंने उपायुक्त से मांग की कि समस्या का जल्द निपटारा किया जाए। चमेरा विस्थापन का दंश झेल रहे परिवारों को रोजगार दिया जाए।
पूरे मामले की जांच होगी: मोख्टा
उपायुक्त सुदेश मोख्टा ने बताया कि प्रभावितों का पक्ष प्रशासन ने सुन लिया है। मामले की जांच की जाएगी। बताया कि प्रभावितों का पक्ष सरकार तक पहुंचाया जाएगा, ताकि जल्द समस्या का समाधान निकल सके।