खुद अपना वेतन करीब दोगुना बढ़ा कर सूबे विधायक मुश्किल में फंस गए हैं। आम जनता में इसे लेकर जबरदस्त नाराजगी है। इस बढोतरी पर अमर उजाला ने आम पाठकों की राय मांगी थीं। सबने एक स्वर से इस तरह एक मुश्त वेतन भत्ते बढ़ाने की निंदा की। पाठकों का कहना है कि लोक तंत्र में सांसद विधायक की भूमिका लोक सेवक की है।
लेकिन ये लोकसेवक एकजुट होकर मनमाने फैसले कर रहे हैं जो जनहित में नहीं है। राज्य आर्थिक संकट में है ऐसे में ये खर्च अनावश्यक है। लाखों छोटे कर्मचारी हैं जो बरसों से वेतन भत्ते बढ़ाने की मांग कर रहे हैं लेकिन आर्थिक तंगी का हवाला देकर सरकार उनकी नहीं सुन रही। लेकिन अपने लिए जनप्रतिनिधियों ने वेतन वृद्धि का रास्ता निकाल लिया। यह अनैतिक है। इसका विरोध होना चाहिए।
कर्मचारियों की तर्ज पर माननीयों को भी बने वेतन आयोग- प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के पूर्व अध्यक्ष पुरूषोत्तम गुलेरिया ने कैबिनेट मंत्रियों, सीपीएस और विधायकों के वेतन एवं भत्तों में भारी भरकम वृद्धि को मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की ओर से अपनी कुर्सी बचाने के लिए ब्रह्मास्त्र करार दिया है।
उन्होंने रविवार को यहां जारी बयान में कहा कि बिना मांग के हुई वेतन वृद्धि विशुद्ध रूप से राजनीतिक निर्णय है। जिससे प्रदेश पर और अधिक आर्थिक बोझ बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि अब इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए कि क्यों न माननीयों के लिए भी अलग से एक वेतन आयोग का गठन किया जाए ताकि बिना ठोस वजह के इस प्रकार के वेतन भत्तों में बढ़ोतरी से बचा जा सके।
पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि केंद्रीय कर्मचारी वेतन आयोग की तर्ज पर सांसदों के लिए मेंबर पार्लियामेंट पे कमीशन और राज्य कर्मचारी वेतन आयोग की तरह राज्यों के लिए स्टेट लेजिस्लेचर पे कमीशन गठित किया जाए। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य के कर्मचारियों को अपने वेतन में वृद्धि के लिए 10 सालों का लंबा इंतजार करना पड़ता है, जबकि माननीयों के वेतन और भत्ते बिन बादल बरसात की तरह कभी भी बरस जाते हैं। जो जनता के हित में नहीं है।
राज्यपाल से मिलें- माननीय मर्जी से अपना वेतन बढ़ा रहे हैं, इसके लिए आम जनता को गवर्नर से मिलना चाहिए। राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर एक अलग संस्था बननी चाहिए जो वर्क आउटपुट और उपलब्ध धनराशि के हिसाब से तय करे कि किसको कितना वेतन मिले। जनता को एकजुट होना चाहिए कि इनके वेतन में वृद्धि होती है तो आम कर्मचारियों के लिए भी पॉलिसी बनाई जाए। तय हो कि पेंशनरों की पेंशन नहीं रोकी जाएगी। -सीमा परिहार, शिमला
इन्हें माननीय न कहा जाए- इन्हें माननीय न कहा जाए। इन्हें जनप्रतिनिधि कहा जाए। जन सेवक कहा जाए। इन्होंने ऐसा क्या अनोखा काम किया है कि इन्हें हम माननीय कहते हैं। चुनाव के वक्त हाथ जोड़कर भिखारी की तरह वोट मांगते हैं। फिर आम जनता को भूल जाते हैं। मर्जी से अपी तनख्वाह बढ़ा लते हैं। -स्वदेश, ऊना
राष्ट्रपति सैलरी फिक्स करें- हमारे नेता ऐसा कौन सा काम करते हैं जो पेंशन के हकदार हैं। एक कर्मचारी पूरी उम्र नौकरी करता है पर वो पेंशन का हकदार नहीं हैं। एक नेता विधायक बन जाए तो पेंशन का हकदार हैं। कानून सबके लिए होना चाहिए। मेरे ख्याल से राष्ट्रपति को सैलरी फिक्स करनी चाहिए। -सुभाष नगरा, पपरोला
जनता के पैसे की ऐसी लूट क्यों- इतना वेतन किस बात का। हिमाचल गरीब प्रदेश है। यहां राजनीति को समाज सेवा कहा जाता है फिर जनता के पैसे की ऐसी लूट क्यों। ये तो हद है कि कोई अपना वेतन खुद बढ़ा रहा है। -अतुल ठाकुर, कुल्लू
लीडर बनने वालों का हो टेस्ट- मेरा सुझाव है कि ओपन डिबेट हो और नेताओं की उम्र सीमा तय हो। साथ ही लीडर बनने वालों का भी एक टेस्ट कराया जाए ताकि इनको भी बेरोजगारी का पता चले। -मुकेश और तेह, जवाली
सत्ता-विपक्ष ने मिल कर बढ़ा ली सैलरी, इसे कहते हैं- एकता में बल- अमर उजाला में आज नेताओं की बड़ी तनख्वाह का लेख पढ़ा। आम आदमी सिर्फ आम आदमी है। जिसको मौका मिलता है वह अपनी चलाते है। हिमाचल प्रदेश जैसे देव भूमि राज्य में किस प्रकार सभी सत्ता और विपक्ष मिल कर अपनी तनख्वाह बड़ा गए।
इस पर हम यही कहेंगे कि एकता में बल है। हम शिमला में जहां रहते है हमारी अपनी पार्किंग है परंतु 3500 रुपये देने के बाद भी घर जाने तक के लिए परमिट नही बनते। वही हालात हिमाचल की जनता के है। शिक्षा विभाग में मिड डे मील कर्मचारिओं को 1000 रु यानि 32 रुपये दिन के और अध्यापकों को 110 रुपये प्रतिदिन मिलते है जो मनरेगा की दिहाड़ी से भी कम है और उसके लिये भी एक साल इंतजार करना होता है। अब आप असली लोकतंत्र की परिभाषा समझ सकते है।
हमारे संविधान में लिखा है कि हमारा देश लोगों से, लोगों के लिए और लोगों द्वारा के मंत्र से लोकतंत्र को मजबूत करता है परंतु सत्ता की चाबी से आम आदमी दूर है। हिमाचल में लाखो कर्मचारी ऐसे है जिनको पेंशन नही मिलती परंतु इसकी चिंता किसको। हम अपना पेट भरेंगे।
आज नारा यही लगता है कि आपकी जो मजबूरी हो हमारी मांगे पूरी हो, यह कर्मचारी लगाये तो बुरा और नेता लगाये तो बल्ले बल्ले। प्रदेश में एक परिवार की आमदनी 7235 रुपये महीना है और वह किस प्रकार गुजारा करते है, इसका ख्याल कौन रखेगा। हाल ही में दिल्ली की सरकार ने अपने भत्ते को 400 गुना बढ़ाया और यहां के आप नेता हिमाचल सरकार को कोस रहे हैं। -डॉ मामराज पुंडीर, शिमला
वादा खिलाफी क्यों- अपनी तनख्वाह मिनटों में बढ़ाने वाले माननीयो से निवेदन है कि कम से कम चुनाव में किए वादों को तो याद रखें। मसलन 10 साल गुजरने के बाद भी पीटीए अध्यापक अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। वादा किया था कि आते ही रेगुलर करेंगे और आज तीन साल गुजरने के बाद भी लाले पड़े हैं। मुख्यमंत्री जी, विधानसभा में बयान दिया कि सरकार की पीटीए अध्यापकों को नियमित करने की कोई मंशा नहीं है।। ऐसी वादा खिलाफी क्यों? -संतोष रावत, सरकाघाट, मंडी
ये बेहद शर्मनाक- ये बेहद शर्मनाक है कि नेता खुद अपना वेतन बढ़ा रहे हैं। नया पे कमीशन जो दस साल बाद आएगा उसमें वेतन दो से बारह हजार तक बढ़ेगा लेकिन नेताओं ने दस मिनट में अपना वेतन दोगुना कर लिया। यह साबित करता है कि किस तरह का लोकतंत्र है भारत में। -डॉ. सचिन बिंद्रा, नाहन
बढ़ी सैलरी से प्राइमरी स्कूलों को मॉडल बनाएं माननीय- सदन से हमेशा वाकआउट पर रहने वाले विधायक और मंत्री अपनी तनख्वाह बढ़ाने के बिल को ध्वनि मत से पास करते हैं और समाज हित के मुद्दों पर आपस में गतिरोध बनाकर रखते हैं। कर्मचारियों के लिए अगर 100 रुपये बढ़ाने हों तो सरकार यह कहते हुए सुप्रीमकोर्ट तक चली जाती है कि हमारे पास पैसे नहीं। माननीयों को अपनी बढ़ी हुई सैलरी समाज हित में लगानी चाहिए।
परिवहन मंत्री जीएस बाली ने एक बेहतर पहल की है। इस समय पूरे प्रदेश में माननीयों की बढ़ी हुई सैलरी को लेकर काफी आक्रोश है। सभी माननीयों को चाहिए कि वे बढ़ी हुई सैलरी से 2 प्राथमिक पाठशालाओं को गोद लें और इन्हें मॉडल बनाएं। इससे पूरे हिमाचल में 1 वर्ष में 140 स्कूल मॉडल बन जाएंगे। इसमें बहुत अधिक खर्च भी नहीं आएगा। समाज को महंगी शिक्षा की बजाय मुफ्त में बेहतर शिक्षा मिलेगी और लोगों में रोष भी खत्म होगा। -आशीष बहल, चुवाड़ी, चंबा
नेताजी! ध्यान रखें, जनता का धैर्य न टूटे- माननीयो! बिना बहस महज दस मिनट में आपने अपने वेतन-भत्ते बढ़ा लिए। लोगों के खून-पसीने की कमाई से टैक्स के रूप में जुटे धन का सबसे घटिया उदाहरण पेश किया है आप लोगों ने। अगस्त 2013 में भी आपने अपने वेतनमानों में लगभग 60 फीसदी बढ़ोतरी की।
आप राजनेता के रूप में जनसेवक हैं या आम सरकारी नौकरी पेशा इंसान। जनता ने तो आपको मात्र अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजा है पर आप तो सबसे अधिक वेतन पाने वाले विशेष अधिकारों से सुसज्जित इंसान बन बैठे। जनता तो यह चाहेगी कि न्यायालय स्व संज्ञान लेते हुए आपको भी मुलाजिम की ही श्रेणी में रखे लेकिन आप तो विधान बनाने वाले हैं।
विधेयक पास कर आप तो फैसला ही पलट देंगे। एक अध्यापक को आप अपने भाषणों में राष्ट्र निर्माता कहते हैं, लेकिन उन्हें महीने के मात्र 4500 रुपये वेतन देते हैं। ये दिहाड़ीदार मजदूर के मासिक मानदेय से भी कम है। आपके ऐसे मनमाने स्वहित फैसलों से भविष्य की परिकल्पना से जनता का विश्वास टूट रहा है। जनाब! बस ध्यान रखें कि जनता का धैर्य न टूटे।- डॉ. कंवर करतार