दिसंबर और जनवरी में सिर्फ बगीचों में तौलिए बनाएं। इस दौरान बगीचों में पेड़ से तीन फुट की दूरी पर तौलिए बनाने का कार्य करें। तीन फुट की दूरी पर तौलियों में हल्की जड़ें होती हैं, जबकि इसके अंदर पेड़ की मुख्य जड़ें गहरी रहती हैं।
इस तरीके से पेड़ों तक खुराक पहुंचने में आसानी रहती है। सेब के पेड़ों में चूना, नीला थोथा और अलसी के तेल का घोल भी लगाएं और इससे पेड़ों पर कैंकर और वूली एफिड की समस्या से निजात मिलती है।
बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एसपी भारद्वाज कहते हैं कि बागवानों को चाहिए कि सेब पेड़ों की काटछांट का काम फरवरी में करें। इससे पेड़ों के जख्म जल्दी भरते हैं और पेड़ को खुराक भी मिल जाती है। पेड़ों को कैंकर और वूली एफिड की बीमारी का असर नहीं रहता।
प्रूनिंग में बागवान जल्दबाजी न करें। दिसंबर और जनवरी में सूखे में उचित दूरी बनाकर तौलिए बनाएं और चूने का घोल बनाकर लगाएं। बगीचों में नमी होने के बाद ही खाद भी डालें।