बार-बार गर्भाधान के बावजूद गर्भधारण नहीं करने वाली गायों में बच्चेदानी की अंदरूनी परत का छिपा संक्रमण प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। पालमपुर स्थित चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विवि के पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के वैज्ञानिकों ने जर्सी नस्ल की संकर गायों पर अध्ययन कर यह तथ्य सामने रखा है। 43 गायों की जांच में 33 यानी 76.74 फीसदी में बच्चेदानी की अंदरूनी परत का संक्रमण पाया गया। इसमें बच्चेदानी की अंदरूनी परत में सूजन और संक्रमण रहता है, लेकिन इसके स्पष्ट बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देते।
अध्ययन में संक्रमण वाली 33 गायों में से 96.97 फीसदी में गर्भधारण से पहले की अवस्था में बैक्टीरिया की मौजूदगी मिली। वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया की पहचान और दवा के प्रति उसकी संवेदनशीलता के आधार पर उपचार किया। उपचार से बैक्टीरिया कम हुआ। अंडोत्सर्जन से पहले बनने वाली पुटिका के आकार में वृद्धि, प्रजनन से जुड़े एस्ट्राडियोल व एलएच हार्मोन के स्तर में बदलाव दर्ज किया गया। अध्ययन में 18 गायों में मदावस्था के दौरान सामान्य से अधिक प्रोजेस्टेरोन पाया गया। इस समूह में उपचार से पहले प्रोजेस्टेरोन का औसत स्तर 0.81 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर था, जो उपचार के बाद घटकर 0.44 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर रह गया। इन गायों में संक्रमण की मात्रा अधिक तथा एस्ट्राडियोल और एलएच हार्मोन का स्तर अपेक्षाकृत कम पाया गया।
उपचार के बाद गायों को तीसरे प्रजनन चक्र से तीन बार तक कृत्रिम गर्भाधान कराया गया। इसके बाद कुल गर्भधारण दर 75.8 फीसदी रही। हालांकि, उपचार के बाद तीसरे चक्र में बैक्टीरिया की मौजूदगी, उसकी संख्या या मात्रा और गर्भधारण दर के बीच सीधा संबंध नहीं मिला। यह शोध विजेंद्र नेगी, पंकज सूद, अंकित आहूजा, रोहित मनकोटिया, आरुषि शर्मा, निशांत कुमार, सुनील कुमार और आंचल बख्शी ने किया है। शोध ‘रिप्रोडक्शन इन डोमेस्टिक एनिमल्स’ नामक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में हाल ही में प्रकाशित हुआ। अध्ययन का उद्देश्य बार-बार गायों में बच्चेदानी के छिपे संक्रमण, प्रोजेस्टेरोन के असामान्य स्तर और प्रजनन संबंधी गड़बड़ियों के बीच संबंध का पता लगाना था।