राजधानी के डीडीयू अस्पताल में बाबा आदम के जमाने का इलाज चल रहा है। आलम ये है कि एक्सरे कराने में सारा दिन लग जाता है। मरीजों को एक काउंटर से दूसरे काउंटर दौड़ाया जा रहा है। ऑन लाइन के जमाने में भी उनसे फार्म भरवाया जा रहा है।
फॉर्म भरने, डॉक्टर के साइन करवाने और फीस जमा करवाने के लिए कभी मरीज को अस्पताल में दिन भर दौड़भाग करनी पड़ती है। ये सब करने के बाद जब तक उसका नम्बर आता है लंच का वक्त हो जाता है।
बाबा आदम के जमाने की एक्सरे मशीन भी ऐसी है जो पेट और पीठ का एक्सरे नहीं कर पाती। मरीज प्राइवेट लैब में जाकर 250 से 300 रुपये देकर ये एक्सरे करवाने को मजबूर हैं। दूर दराज से आने वाले मरीज बेहाल हैं। ये हाल राजधानी का है। सूबे के सुदूर इलाकों के सरकारी अस्पतालों का ईश्वर ही मालिक है।
एक्सरे मतलब दिन भर का सिरदर्द
पुराने भवन में चल रही ऑर्थो ओपीडी में बैठने वाले डॉक्टर एक्सरे के लिए लिखते हैं। इसके बाद मरीज को फार्म भरने के लिए कमरा नम्बर 34 या नई बिल्डिंग स्थित काउंटर नंबर- 201 में भेजा जाता है।
फिर डॉक्टर का साइन लेने मरीज को वापस ओपीडी आना पड़ता है। साइन के बाद मरीज को फिर नई इमारत में फीस जमा करने के लिए जाना पड़ता है। यहां उसे कमरा नं 213 पर लाइन में खड़ा होना पड़ता है। एक्सरें फीस जमा करने के बाद मरीज को फिर फॉर्म लेकर दोबारा कमरा नंबर 9 में एक्सरे के लिए पुराने भवन में आना पड़ता है। साढे 12 बजे तक उन्हें एक्सरे की रिपोर्ट मिलती है।
जिसे लेकर मरीज को फिर ओपीडी में बैठने वाले डॉक्टर के पास जाना होता है। लाइन लंबी हो तो उस मरीज का नम्बर लंच के बाद आता है। यानी पूरा दिन एक्सरे के नाम। इस पूरी प्रक्रिया में मरीज को पांच बार लाइन में खड़ा होना पड़ता है।
स्टाफ जरूर इतना मददगार है कि वह बच्चों और जरूरतमंदों को प्राथमिकता के आधार पर मौका देता है। एक्सरे करवाने पहुंची पंथाघाटी की अनिता ने बताया कि इतनी भागदौड़ में मरीज और बीमार हो जाता है। सारी प्रक्रिया एक जगह पूरी होनी चाहिए।
रोजाना 130 से ज्यादा एक्सरे
डीडीयू में रोजाना करीब 130 मरीजों के एक्सरे होते हैं। इसके लिए यहां तीन कर्मचारी तैनात हैं। सुबह दस से साढ़े 11 बजे तक एक्सरे होते हैं। इनमें सुबह साढ़े 11 से साढ़े 12 बजे तक डेंटल एक्सरे किए जाते हैं। सुबह होने वाले एक्सरे की रिपोर्ट साढ़े 12 बजे जबकि दोपहर को होने वाले एक्सरे की रिपोर्ट ढाई बजे दी जाती है।