30 साल बाद बदली जा रही देश की शिक्षा नीति को लेकर सोमवार को नई दिल्ली में बैठक हुई। प्रदेश सरकार की सिफारिशों को उच्च शिक्षा निदेशक दिनकर बुराथोकी ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की कमेटी से अवगत कराया।
सरकार ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों की प्राथमिक पाठशालाओं में प्री नर्सरी कक्षाएं शुरू करने, पहली कक्षा से अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाने और परीक्षाओं में कंपार्टमेंट की व्यवस्था को समाप्त करने की वकालत की। नई शिक्षा नीति बनाने के लिए सरकार ने प्रदेश के हर वर्ग से राय ली है।
पंचायत, जिला परिषद प्रतिनिधियों के अलावा शिक्षकों, अभिभावकों, विद्यार्थियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से चर्चा की गई है। इन सभी वर्गों से लिखित राय भी ली गई। हिमाचल ने नई शिक्षा नीति जन सहभागिता से बनाई है।
1986 में हो चुकी है पहल
साल 1986 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी शिक्षा नीति के जरिये शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाने की पहल की थी। पहली बार तकनीकी शिक्षा का विकास हुआ और एजूकेशन में निजीकरण को बढ़ावा मिला, लेकिन यहीं से एक बड़ी समस्या भी पैदा हुई।
प्राइवेट स्कूलों और निजी तकनीकी संस्थानों का जाल बढ़ता गया और क्वालिटी एजूकेशन महंगी और सामान्य वर्ग से दूर होती गई। केंद्र सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए नई शिक्षा नीति बनाने का फैसला लिया है। संभावित है कि साल 2016 में नई शिक्षा नीति तैयार होगी।
हिमाचल सरकार ने ये की हैं सिफारिशें
- मिड डे मील योजना को बंद कर सूखा राशन वितरण हो।
- अध्यापकों की नियुक्तियां एसएमसी की बजाय अधीनस्थ चयन बोर्ड से हो।
- पहली से आठवीं कक्षा तक परीक्षा पैटर्न दोबारा शुरू हो।
- शिक्षकों का हर साल प्रोफेशनल डेवलपमेंट का कोर्स हो।
- आईसीटी लैब में प्रशिक्षित शिक्षकों और स्टाफ की नियुक्ति हो।
- विज्ञान और गणित विषय को रोचक बनाकर पढ़ाया जाए।
- रट्टा लगाने की प्रथा खत्म हो, सहज ही समझने को प्रोत्साहित करें।
- प्राथमिक स्कूलों में ही विषय विशेषज्ञ को तैनात किया जाए।
- रूसा बेहतर बनाने के लिए कॉलेजों-विवि में सामंजस्य होना चाहिए।
- कम से कम दो साल बाद स्कूल, कालेजों, विवि में सिलेबस अपडेट हो।
- समय की मांग के अनुसार कालेजों में नए-नए कोर्स शामिल किए जाएं।