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शिमला: 5100 साल पुरानी पांडुलिपि में महाभारत के प्रसंग, तंत्र विद्या का उल्लेख; कई भाषाओं और लिपियों का उल्लेख

Mon, 19 Oct 2026 10:26 AM IST
Ankesh Dogra हर्षित शर्मा, शिमला।

सार

शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में प्रदर्शित एक दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपि प्राचीन भारतीय ज्ञान और संस्कृति के अध्ययन को लेकर चर्चा में है। ओडिशा में मुक्ति राम द्वारा खोजी गई बताई जा रही इस पांडुलिपि में महाभारत और हिमालय में पांडवों की यात्रा के प्रसंग होने का दावा किया गया है। इसे लगभग 5100 साल पुराना बताया जा रहा है, लेकिन इसकी उम्र की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

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शिमला में एडवांस्ड स्टडी में रखी गईं पांडुलिपियां। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (एडवांस्ड स्टडी) शिमला में प्रदर्शित एक दुर्लभ पांडुलिपि हिमालय की प्राचीन तंत्र विद्या और सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन का विषय बनी हुई है। ओडिशा में मुक्ति राम ने इस पांडुलिपि की खोज की थी। इसे लगभग 5100 साल पुराना बताया गया है। इसमें महाभारत के प्रसंगों की जानकारी मिलती है। ताड़पत्रों पर लिखी यह पांडुलिपि आसानी से समझ में नहीं आती। इस कारण अब तक इसका पूरा अनुवाद नहीं हो पाया है। मुक्ति राम इस पर शोध कर रहे हैं। अब तक अनुवादित अंशों में महाभारत और हिमालय में पांडवों की यात्रा से जुड़े प्रसंग सामने आए हैं।

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उपलब्ध जानकारी के अनुसार पांडुलिपि में पाली, संस्कृत, कुरुंजी और ओडिया भाषाओं का उल्लेख है। इसकी विषयवस्तु को समझने के लिए प्राचीन भाषाओं, लेखन प्रणालियों और ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन किया जा रहा है।  पांडुलिपि की उम्र को लेकर कार्बन डेटिंग और नासा के टेक्सास स्थित केंद्र से पुष्टि होने की जानकारी भी दी गई है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक वैज्ञानिक रिपोर्ट स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सकी है। इसलिए इसकी वास्तविक आयु को लेकर वैज्ञानिक दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण है। मुक्ति राम का शोध प्राचीन संस्कृति के अस्तित्व और विकास से जुड़े सवालों पर भी केंद्रित है। वह आर्यों के भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन सभ्यताओं से पहले मौजूद होने और बाद में यहां से दूसरे क्षेत्रों की ओर जाने की परिकल्पना पर भी काम कर रहे हैं।

आर्यों के प्रवास पर शोध
आर्कियोलॉजिस्ट और एडवांस्ड स्टडी में फैलोशिप कर रहे ओडिशा के मुक्ति राम के अनुसार पांडुलिपि प्राचीन संस्कृति के अस्तित्व और स्वरूप को समझने की संभावनाएं प्रस्तुत करती है। वह इस परिकल्पना पर भी शोध कर रहे हैं कि आर्य प्राचीन सभ्यताओं के विकास से पहले भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद  थे और बाद में यहां से दूसरे क्षेत्रों की ओर चले गए। यह उनकी शोध परिकल्पना है। इसे स्थापित करने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भाषायी साक्ष्यों की आवश्यकता होगी। पांडुलिपि का प्रमाणित अनुवाद और अन्य ऐतिहासिक स्रोतों से उसका तुलनात्मक अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
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क्या है कार्बन डेटिंग
कार्बन डेटिंग जैविक पदार्थों की उम्र का अनुमान लगाने की वैज्ञानिक विधि है। पेड़-पौधों और अन्य जीवों में कार्बन-14 नामक रेडियोधर्मी समस्थानिक मौजूद होता है। जीव के मरने के बाद इसमें कार्बन-14 की मात्रा धीरे-धीरे घटने लगती है। वैज्ञानिक बचे हुए कार्बन-14 का विश्लेषण कर सामग्री की अनुमानित उम्र निर्धारित करते हैं। ताड़ के पत्ते जैविक पदार्थ हैं, इसलिए उपयुक्त नमूने की कार्बन डेटिंग की जा सकती है। यदि पांडुलिपि की उम्र लगभग 5100 वर्ष प्रमाणित होती है, तो इसका समय करीब 3100 ईसा पूर्व के आसपास होगा। इतनी पुरानी सामग्री प्राचीन सभ्यताओं और भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। 
 
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