हिमाचल के पहाड़ अब ज्यादा बोझ सहन नहीं कर सकते हैं। पहाड़ भीतर से खोखले हो चुके हैं। जमीन पर पानी रिसने के बजाए पहाड़ों ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया है। भूकंप आने से यह पहाड़ अपने जगह से खिसक कर तबाही मचा सकते हैं। पर्यावरण वैज्ञानिक योगेंद्र सेन गुप्ता की ओर से किए गए शोध में इसका खुलासा हुआ है।
उन्होंने शुक्रवार को उन्होंने इस शोध के रिसर्च पेपर राज्यपाल पाल देवव्रत आचार्य को सौंपे और उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया है। उन्होंने अपने रिसर्च पेपर में ग्रीन एरिया को बहाल किए जाने पर भी सख्त आपत्ति जताई है। राजधानी शिमला कच्चीघाट को उन्होंने सबसे खतरनाक बताया है।
राज्यपाल देवव्रत आचार्य को सौंपे रिसर्च पेपर
राज्यपाल आचार्य देवव्रत को रिसर्च पेपर सौंपेते पर्यावरणविद्।
यहां जमीन पर 75 डिग्री एंगल में कंस्ट्रक्शन हुई है। 80 फीसदी एरिया मकानों से भर चुका है। यहां 5 से 6 मंजिल भवनों का निर्माण हुआ है। 3000 की जनसंख्या पर हेक्टेयर यहां बस चुकी है। इसी तरह ढली, समिट्री, संजौली, जाखू, न्यू शिमला, कृष्णानगर में भी जरूरत से ज्यादा कंस्ट्रक्शन हो चुकी है। पहाड़ी क्षेत्र में 40 से 45 डिग्री एंगल पर भवनों का निर्माण होना चाहिए।
चहेतों को फायदा देने के लिए खोला जा रहा ग्रीन एरिया
पर्यावरण वैज्ञानिक योगेंद्र सेन ने बताया कि चहेतों को फायदा देने के लिए प्रदेश सरकार ग्रीन एरिया को खोलना चाहती है। राजधानी शिमला में राजनेताओं के प्लॉट है, जहां कंस्ट्रक्शन पर प्रतिबंध लगाया है। अब सरकार उसे खोलने की तैयारी में है।
किस क्षेत्र में कितने स्लोप में बने है भवन
क्षेत्र स्लोप (डिग्री)
ढली - 70
समिट्री -70
संजौली - 70
जिवणू कालोनी - 60
न्यू शिमला - 45
सेंट्रल शिमला - 60 डिग्री
कृष्णा नगर - 70
पाजली - 60
चक्कर - 65
टुटू - 50 डिग्री