एमसी शिमला सहित राज्य की 38 तहसीलों में 20 दिसंबर 2018 तक बंदरों को मारने के लिए दी गई छूट खत्म हो जाएगी, लेकिन साल 2016 से अब तक सिर्फ 5 बंदरों को मारने की रिपोर्ट ही वन विभाग के पास पहुंची है। इसमें किलिंग का एक मामला सोलन के कुनिहार तहसील का है। चार मामले जिला सिरमौर के रेणुका से आए हैं।
शहरों में बंदरों की समस्या के लिए कूड़ा भी जिम्मेदार- वन विभाग की मानें तो शहरों में खुले में पड़ा कूड़ा बंदरों की समस्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। शिमला शहर में कई इलाकों में कूड़ा खुले में पड़ा रहता था। इसके चलते बंदर खाने की तलाश में यहां पहुंचते हैं। इससे उनके व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है।
हिमाचल में बंदरों की नसबंदी साल 2006-07 से शुरू हुई। अब तक करीब 1 लाख 44 हजार 520 बंदरों की नसबंदी हुई है। विभाग के सर्वे के मुताबिक राज्य में बंदरों की संख्या 207614 है। बंदरों की नसबंदी पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। यदि मादा बंदर गर्भवती हैं तो उसकी नसबंदी नहीं की जाती। इसे छोड़ना पड़ता है। बाद में इसकी नसबंदी हुई या नहीं, इसका पता लगाना मुश्किल रहता है।
इसके अलावा कई बार ग्रुप में भी कुछ बंदर बिना नसबंदी के ही रह जाते हैं। वन विभाग के सीसीएफ वन्यप्राणी दक्षिण सुशील कप्टा ने कहा कि बंदरों की समस्या को लेकर विभाग पंचायतों में कैंप लगाकर लोगों को जागरूक कर रहा है। प्रति बंदर मारने पर लोगों को 500 रुपये दिए जा रहे हैं। लोगों को चाहिए कि बंदरों की समस्या के समाधान के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार करें।