लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओं का करियर चौपट हो गया है। चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों की हार का अंतर प्रदेश के इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। निकट भविष्य में यह रिकॉर्ड टूटना संभव नहीं लगता। न आश्रय शर्मा लोकसभा चुनाव जीते और न ही कांग्रेस में सुरेश चंदेल का जादू चल पाया।
पंडित सुखराम ने अपने पोते आश्रय की लांचिग करने के लिए कांग्रेस हाईकमान से टिकट लेने को पाला बदलकर भाजपा को बाय-बाय कर दिया था। सुखराम अपने पोते के साथ भले ही कांग्रेस में आ गए हैं।
सुखराम के पुत्र अनिल शर्मा भाजपा सरकार में मंत्री पद पर काबिज थे, परंतु उनको अपने बेटे आश्रय शर्मा के कांग्रेस टिकट से चुनाव लड़ने के कारण मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। यानी, सुखराम के पोते को लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ गया, जबकि बेटे अनिल शर्मा को फिलहाल मंत्री पद छोड़कर विधायक ही रहना होगा।
दूसरी ओर, हमीरपुर से पूर्व सांसद सुरेश चंदेल को कांग्रेस में लेने का प्रमुख कारण यही था कि उनके कांग्रेस में आने से भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी की जा सकेगी और इसका लाभ हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी रामलाल ठाकुर को मिलेगा। यहां भी कांग्रेस का गणित गड़बड़ा गया और रामलाल को हार का सामना करना पड़ा।