मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है घुमारवीं उपमंडल के बरोटा गांव के लग्नेश कुमार ने। विपरीत परिस्थितियों और शारीरिक चुनौती को मात देकर कानून की पढ़ाई कर लग्नेश हिमाचल के पहले नेत्रहीन अधिवक्ता बने हैं। वह घुमारवीं सिविल कोर्ट में न केवल वकालत कर रहे हैं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा बनकर भी उभरे हैं। वर्ष 2009 में सामान्य से दिखने वाले आंखों के संक्रमण ने धीरे-धीरे उनकी दुनिया में अंधेरा भर दिया। बड़े अस्पतालों तक इलाज करवाया गया, लेकिन फिर भी 33 वर्षीय लग्नेश ने आंखों की रोशनी पूरी तरह खो दी। पिता के निधन के बाद घर की आर्थिक स्थिति भी डांवांडोल थी। माता आंगनबाड़ी में हेल्पर के रूप में काम कर घर का गुजारा कर रही थीं, लेकिन उन्होंने अपने बेटे के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया।