जब अमर उजाला ने सीबीआई के मुख्य प्रवक्ता अभिषेक दयाल से ये पूछा कि अगर मामले को सुलझा लिया गया है तो आरोपी अनिल कुमार ने अपराध को किस तरह से अंजाम दिया? क्या चार फुट के आरोपी के लिए जंगल में ये सब अकेले संभव था? अपराध को क्या वहीं अंजाम दिया गया, जहां पर शव मिला? घटनास्थल के साथ ऊपर सड़क है तो ये कैसे संभव हुआ?
अगर दुराचार इसी जगह पर जबरन किया गया तो कपड़े फटे क्यों नहीं? ये किनारे में ऐसे रखे गए थे, जैसे खोलकर रखे गए हों, इस पर क्या कहते हैं? इसके जवाब में मुख्य प्रवक्ता अभिषेक दयाल ने कहा कि वह जंगल में उसे खींचकर ले गया। उसके बाद दुराचार और हत्या हुई।
ये कैसे हुई, इस बारे में भी जल्दी खुलासा किया जाएगा। मामला अभी बंद नहीं हुआ है। जांच जारी है। इस मामले को सुलझाने की बात डीएनए के नमूनों के उच्च तकनीक से मिलान के बाद की गई है। इस मामले के कई पहलूओं को आने वाले दिनों में छानबीन के बाद स्पष्ट किया जाएगा।
गुड़िया के पिता ने कहा- मेरा मन बोलता है कि वारदात को कहीं कमरे में अंजाम दिया गया है। वारदात जंगल में नहीं हुई। वहां उसे फेंका गया है। मुझे मालूम हुआ कि सीबीआई तीन चिन्हित स्थानों पर आरोपी को जंगल में लेकर गई। इतनी सी जांच भी गले नहीं उतर रही। घटना के बाद ढाई दिन तक मेरी बेट कहां रही? मुझे बताओ।
ये अकेले चिरानी का काम नहीं है। लोकल लोगों के संलिप्त न होने की बात भी मेरे गले नहीं उतर रही है। एक सवाल ये भी है कि क्या एक चिरानी के लिए कांस्टेबल से लेकर आईजी तक सलाखों के पीछे चले गए?
इसका भी मुझे जवाब नहीं मिला। जिसको पकड़ा है, अगर वही आरोपी है तो उसे फांसी से कम सजा न मिले। मैं कोर्ट जाकर खुद इसकी मांग करूंगा। हालांकि, मुझे सीबीआई की जांच पर पूरा भरोसा है। जरूर सारी कहानी सामने आएगी। सीबीआई जांच बंद न करे।
तो क्या हिमाचल प्रदेश में कांस्टेबल से लेकर आईजी तक नौ पुलिस वाले अपनी कुर्सियां बचाए रखने के मोह में दबाव मेें आकर ही नप गए? गुड़िया कांड के बाद जनाक्रोश का सामना करती तत्कालीन सरकार का पुलिस महकमे पर भारी दबाव था। सामने विधानसभा चुनाव थे। सीबीआई सूत्रों की मानें तो केस सुलझाने की जल्दबाजी में जांच अधिकारियों ने मनगढ़ंत कहानी ही गढ़ डाली।
नतीजे में कांस्टेबल से लेकर आईजी तक कंडा और कैथू जेल पहुंच गए। पुलिस की निगरानी में किए गुड़िया के शव के पोस्टमार्टम से मिले डीएनए से ही सीबीआई ने गुत्थी सुलझाई। बताया जा रहा है कि फर्जी तरीके से फांसे राजू और सुभाष तब तक अज्ञात चिरानी का सुराग पुलिस को बार-बार दिए जा रहे थे, मगर उनकी एक नहीं सुनी गई। उल्टा गुनाह कबूल करवाने को उन्हें थर्ड डिग्री दी गई। छह जुलाई को जब गुड़िया दुराचार और हत्या मामला सामने आया तो दुराचारी हत्यारे को जल्दी पकड़ने के लिए जनता ने खासा दबाव बनाया।
गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए। लोगों ने कानून-व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिए थे। जनता ही नहीं बल्कि तमाम विरोधी राजनीतिक दल इस मामले पर सरकार की घेराबंदी किए थे। ऐसे मेें तनाव में आई तत्कालीन सरकार के पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों पर खुद को साबित करने का दबाव बना रहा। माना जा रहा है कि पुलिस अधिकारियाें ने अपनी प्रतिष्ठा और कुर्सियां बचाने को मनगढ़त कहानी गढ़ डाली और छह स्थानीय युवकों को ही धर दबोचकर बगैर तथ्यों को पुष्ट किए उन्हें दुराचारी और कत्ल का आरोपी घोषित कर डाला।
इसी बीच कोटखाई पुलिस थाने में गुनाह कबूल करवाने के चक्कर में पुलिस वालों ने ही आरोपी बनाए निर्दोष माने जा रहे सूरज सिंह को पीट-पीटकर मार डाला। उसकी हत्या का इल्जाम उसी के साथ लॉकअप में बंद रहे दूसरे आरोपी बनाए राजू पर मढ़ डाला। कहा जा रहा है कि इस तरह से गुड़िया मामले से जुडे़ इस दूसरे हत्याकांड की भी फर्जी कहानी बनी। थाने के संतरी दिनेश शर्मा को भी फंसाने की कोशिश की गई। मगर बाद में वही सीबीआई का गवाह बना।
जनता इन तमाम झूठी कहानियों को भांप गई थी। इसी बीच गुस्साए लोगों ने कोटखाई थाने को जला डाला। दबाव के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस प्रकरण की सीबीआई जांच करवाने का एलान करना पड़ा। इसी दौरान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में सू-मोटो लेते हुए जांच सीबीआई को दी।
सीबीआई निदेशालय ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर यह जांच नई दिल्ली स्थित विशेष अपराध अन्वेषण शाखा को दी। सीबीआई की इस टीम का नेतृत्व एसपी एसएस गुरुम को दिया गया। उनकी टीम में एएसपी आरके सेठी और डीएसपी सीमा पाहूजा हैं।
इन्होंने नौ महीने की जांच के बाद आरोपी का डीएनए गुड़िया और घटनास्थल पर मिले जेनेटिक मैटरियल से मिलाने का दावा किया। कई गवाहों को भी तैयार किया। अब सीबीआई के मुताबिक आरोपी अनिल ने गुड़िया से दुराचार के बाद उसकी हत्या की है।
गुड़िया न्याय मंच ने गुड़िया मामले में चिरानी की गिरफ्तारी पर सवाल खड़े किए हैं। मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा ने कहा कि मामले में चिरानी की गिरफ्तारी जनता के गले नहीं उतर रही। सीबीआई की थ्योरी पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं।
क्या यह मुमकिन है कि एक साधारण चिरानी सीबीआई और पुलिस को 10 महीने तक बेवकूफ बनाता रहा। उन्होंने कहा कि इस हाई प्रोफाइल मामले में सीबीआई और पुलिस की कार्यप्रणाली शुरू से ही संदेह के घेरे में रही है।
कोटखाई में गुड़िया से दुराचार और हत्या के मामले में आखिर इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) में पोस्टमार्टम के दौरान जुटाए सैंपल ही सीबीआई के काम आए। घटना स्थल से जब गुड़िया का शव पोस्टमार्टम के लिए आईजीएमसी लाया गया था तो उस दौरान डॉक्टरों ने गुड़िया की बॉडी से जेनेटिक मैटीरियल के सैंपल लेकर फोरेंसिक जांच के लिए जुन्गा भेजे थे।
इन्हीं जेनेटिक मैटीरियल से ही सीबीआई गुड़िया के आरोपी अनिल तक पहुंची है। एफटीए कार्ड पर भेजे सैंपल से आरोपी नीलू सहित अन्य संदिग्धों के डीएनए नमूनों का मिलान करवाया। सूत्रों के अनुसार केवल नीलू के सैंपल ही मैच हुए हैं, जिसके बाद सीबीआई आरोपी तक पहुंच पाई।
माना जा रहा है कि सीबीआई से पहले गुड़िया मामले की जांच कर रही पुलिस की एसआईटी ने भी फोरेंसिक लैब जुन्गा से जेनेटिक मैटीरियल का कई संदिग्धों से सैंपल मिलान करवाया। सैंपल मिलान से पहले पुलिस ने छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, जो पुलिस एसआईटी के लिए घातक साबित हुआ।
सीबीआई को मामला सौंपने के बाद सप्ताह के भीतर टीम शिमला पहुंची। इसमें एक टीम आईजीएमसी गई जबकि दूसरी टीम जुन्गा पहुंची। आईजीएमसी में डॉक्टरों से भी इस मामले को लेकर पूछताछ हुई।
गुड़िया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और करीब 42 फोटो कॉपी सीबीआई अपने साथ ले गई। इसके बाद ही सीबीआई ने छानबीन शुरू की थी।