जिस मां की गोद में जिंदगी के शुरुआती पांच महीने बीते, उस गोद को वे दोनों मासूम भूल नहीं पाए हैं। उस गोद से बिछड़े एक महीना हो गया। शिमला के कमला नेहरू अस्पताल में बदले गए दोनों मासूम अभी तक सदमे में हैं। बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है।
बेटी अमानत तो अपने मां-बाप के पास पहुंचकर कुछ ठीक है लेकिन बेटे नितांश की भूख-प्यास और नींद उड़ गई है। उसे बुखार हो गया। मासूम बेटे नितांश ठाकुर के असली मां-बाप अपने बच्चे को लेकर शिमला के खलीनी उस घर की तरफ भागे जहां उसकी शुरुआती परवरिश हुई थी।
बेटा पांच महीने बाद अपने पुराने घर पर पहुंचकर चहक उठा है। वह तुरंत अपनी पहली मां की गोद में पहुंच गया। मां बेटा दोनों फूट-फूटकर रोने लगे। वहां मौजूद सबकी आंखें नम हो गईं। पिता अनिल और मां शीतल ने पांच महीने की लड़ाई लड़ने के बाद 26 अक्तूबर को बेटे निशांत को पाया है।
अनिल कुमार ने बताया है कि नितांश खलीनी से भट्ठाकुफर आकर अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाया है। मां शीतल का वह दूध नहीं पीता। सही से नींद भी नहीं ले रहा है। नितांश पहले से दुबला भी हो गया है। वह रोता तो नहीं लेकिन हरदम बेचैन रहता है। उसे हल्का बुखार भी रहता है।
पुरानी मां को देखकर चहक उठा मासूम
बच्चे की सेहत में सुधार लाने के लिए वह दो बार आईजीएमसी में मनोवैज्ञानिक से भी मिल चुके हैं लेकिन, कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। मनोवैज्ञानिक छह महीने के बच्चे का मन क्या समझेंगे। अनिल ने बताया कि जिस दिन वह नितांश को लेकर जितेंद्र के घर पहुंचे तो नितांश वहां पहुंचते ही चहक उठा।
ऐसा लगा जैसे वह जितेंद्र के सभी घर वालों को पहचान गया। अंजना की गोद में जाते ही नितांश उन्हें तो भूल ही गया है। ठीक ऐसे ही बेटी अपने पुराने मां बाप को देखकर चहक उठी। दोनों बच्चे अब अपनी पहली मां का दूध पी रहे हैं। शीतल अपने बेटे के साथ अंजना के घर पर ही रह रही है।
साथ में उनकी अपनी बेटी भी है। अनिल मायूस हैं। कहते हैं, हमारा अजीब हाल है। हमारा बेटा हमारा होते हुए भी हमें पहचान नहीं पा रहा। बेटी उस घर में है, जिसकी हर पल याद सताती है। हम दोनों पर परिवार व्हाट्सऐप पर उनकी फोटो शेयर करते हैं। दोनों परिवार तस्वीर देखकर खुश हो लेते हैं।
अच्छी बात यह कि जितेंद्र का परिवार भी इस दर्द को समझता है। वे कहते हैं - अगर अस्पताल शुरू में ही हमारी बात मान लेता तो यह नौबत न आती। उधर, जितेंद्र ने कहा कि जैसे ही मेरे घर में नितांश वापस आया, वह सबको पहचान गया।
उसकी तबीयत कुछ खराब थी, उसे हलका बुखार था। खलीनी के एक निजी क्लीनिक में उसकी स्वास्थ्य जांच करवाई। उन्होंने कहा कि अब उसकी तबीयत में सुधार है। उन्होंने कहा कि नितांश उनकी पत्नी अंजना से फीडिंग ले रहा है। दोनों बच्चे खुश हैं।
26 अक्तूबर को असल मां-बाप को मिले थे बच्चे
कमला नेहरू अस्पताल में 26 मई को बदले गए बच्चे पांच महीने बाद 26 अक्तूबर को अपने असल मां-बाप को मिले थे। खलीणी में आयोजित अन्नग्रहण रस्म के बाद बच्चों की अदला-बदली हुई थी। इस दौरान दोनों मांएं बिलख पड़ी थी।
पांच महीनों तक बच्चों को गले से लगाकर रखने वाली माताओं पर अपने जिगर के टुकड़े को दूसरे को सौंपने का एक-एक पल भारी पड़ रहा था। दोनों माताओं ने एक-दूसरे की गोद में बच्चों को सौंपते हुए, इस अनोखे रिश्ते को ताउम्र निभाने की बात कही थी।
26 मई को केएनएच में हुई थी बच्चों की अदला-बदली
केएनएच प्रबंधन की लापरवाही के चलते 26 मई को खलीनी के जितेंद्र-अंजना और भट्ठाकुफर के अनिल-शीतल के बच्चे एक-दूसरे से बदल गए थे। अनिल और शीतल ने अपने बेटे को पाने के लिए डीएनए टेस्ट करवाए। हाईकोर्ट तक मामला पहुंचाया। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दोनों परिवारों के बीच बच्चों की अदला-बदली करने का समझौता हुआ।