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रूस में भी था ज्वालादेवी का एक अनोखा मंदिर

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हिमाचल के ज्वालादेवी का मंदिर पूरी दुनिया में मशहूर है। मगर बहुत कम लोगों को पता है कि ऐसा ही एक चमात्कारिक मंदिर रूस में भी था। बाकू स्थित इस मंदिर में भी आग की लपटें थी जो कांगड़ा की मां ज्वालाजी से कहीं बड़ी थी।
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यह मंदिर बाकू की ज्वालामाई के नाम से दुनिया भर में विख्यात था। यहां भारत पाकिस्तान समेत एशिया के हिंदू लोग यात्रा करने जाते थे। मगर क्योंकि यह मंदिर गैस के भंडार वाले क्षेत्रों से घिरा था इसीलिए इसे बुझाने का फैसला लिया गया।

रूसी सरकार मानती थी कि यदि ज्वालाजी के इस मंदिर में निरंतर आग जलती रही तो इससे आपसपास के गैस भंडार क्षेत्रों और उसमें लगने वाले गैस प्लांट को नुकसान हो सकता है। सरकार ने पता लगाया कि मंदिर के लिए गैस रिसाव कहां से हो रहा है। इसके बाद मंदिर की आग बुझाकर यहां होने वाले गैस रिसाव को भी खत्म कर दिया गया।
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किताब में किया गया है मंदिर का जिक्र

मशहूर घुम्मकड़ विद्वान राहुल सांस्कृतायन ने करीब सात दशक पहले कांगड़ा के ज्वालादेवी मंदिर का दौरा किया। उन्होंने अपने यात्रा वृतांन्त में उस दौर का दिलचस्प वर्णन किया है।

अपने इस वृतान्त में उन्होंने बाकू के उस मंदिर का भी जिक्र किया जहां निरन्तर ज्वाला निकला करती थी। लेकिन आसपास पेट्रोल के कुंए होने के कारण रूसी सरकार ने उस ज्वाला को हमेशा के लिए बुझा दिया। पेश है राहुल सांस्कृतायन के शब्दों में उस दौर के ज्वालादेवी मंदिर की कहानी।

एक बजे हमारी बस अड्डे पर जा खड़ी हुई। पास में एक नई विशाल और स्वच्छ धर्मशाला थी, पर हमें तो पहले माई का दर्शन करना था, फिर जो ही बस मिले उससे कांगड़ा लौट जाना था। मंदिर टेकरी की जड़ में हैं। यद्यपि यहां के पहाड़ नंगे नहीं है, पर उस गरमी में जान पड़ता था, वह है ही नहीं, अथवा माई की ज्वाला ने उन्हें झुलस दिया है।

ऐसे पहुंचे ज्वालाजी

हम संकरी गली के दोनों तरफ खड़ी दुकानों और पंडो के घरों की छाया की यथाशक्य ओट लेते उपर की ओर बढ़े। किसी पंडे का न आना हमें पसंद नहीं था। क्योंकि उनसे कितनी ही मनोरंजक बातें मालूम होती हैं। भूकंप का प्रभाव यहां अधिक होना चाहिए था, क्योंकि ज्वालामुखी यहां अवस्थित है, पर जान पड़ता है, अकबर की तरह भूकंप के मन्सूबे को भी माई ने विफल कर दिया।

यह ठीक है, कि 1947 ई के भीषण कांड के बाद कोई इस बात का संदेह नहीं कर सकता था, कि हम दोनों में से कोई मुसलमान होगा। जहां पूर्वी पंजाब और इधर का पहाड़ भी अब निर्मुसलमान है, पर यदि पुजारियों को मालूम हो जाए कि हम श्रद्घा‌हीन या नास्तिक हैं तो मंदिर में स्वच्छंदतापूर्वक घुस कर फोटो लेना आसान नहीं होता। इसीलिए हम हर समय अपनी श्रद्घा भक्ति का प्रदर्शन करने के लिए तैयार थे।

नई शिक्षित पीढ़ी से उसके परम सनातनी होने पर भी हमें खतरा नहीं था, जबकि मेरी पुस्तकों को पढ़ कर विचारों से परिचित होने पर भी वह बदरीनाथ जैसे धाम में राहुल के स्वागत में भोज दे सकते थे।

ज्वालाजी पहुंचकर सबसे पहले किया ये काम

शोभाकांत भी उतने नास्तिक नहीं थे, यह तो इसी से मालूम होगा कि नेपाल के एक परमपुनीत शिवलिंग के पत्‍थर नहीं फॉसील होने का संदेह होने पर उन्होंने उसमें से थोड़ा तोड़ कर किसी कॉलेज की प्रयोगशाला में भेजकर ही नहीं छोड़ा बल्कि वहां के एक परम आस्तिक संस्कृत के महापंडित से यह कहने से भी बाज नहीं आए कि वहां पत्‍थर का शिवलिंग नहीं, बल्कि करोड़ों साल पुरानी हड्डी पुज रही है।

फाटक के भीतर घुसते ही शोभाकांत को आगे बढ़ा मैने पहली बंदूक दाग दी। फुरती से झटपट कैमरे से फोटो उतारना बंदूक दागना ही है। वर्षों से अभ्यस्त होने से मैं इसके महातम को जानता हूं। किसी पंडे पुजारी से न पूछो, न उसे बोलने का अवसर दो, गोली दाग देने पर यदि कोई नाराजी प्रकट करे, तो परम नम्रता दिखलाते अपनी अज्ञता प्रकट कर अफसोस कर दो।

मंदिर के भीतर की कहानी

यहां नहीं, तो नेपाल के पशुपति मंदिर में एक बार ऐसा ही मैंने किया था। मंदिर के गर्भगृह में चमड़ा नहीं जाता, यह कहकर पुजारी ने कैमरों को बाहर एक खूंटी पर टंगवा दिया और हम भक्तिभाव से विन्रम हो माई के अपने श्रीकोष्ठक में पहुंचे। सचमुच इतने सालों से मैं भी कितना भ्रम में था, जो यही समझता था कि वहां धांय धांय आग जल रही होगी। तीन टेमें दीवार में टिमटिमा रही थीं।

कुंड की दोनों बहने कुछ सशक्त थीं। बाकी तीन बहनों के बारे में शोभाकांत ने एक पर हाथ घुमाकर कहा कि इसमें हल्की सी गैस की गंध आती है। पर वह अतिक्षीण थी। पुजारी बराबर कोई सुगंधि उन पर डालते ही रहते हैं, फिर मंदिर भीतर से क्यों न मह मह करता रहे। दर्शन कर प्रसाद लिया। चव्‍वनी दुव्वनी से भी काम चल सकता था, पर माई के चरणों में एक रुपए से कम चढ़ा अपनी श्रद्घा का अनादर कैसे कर सकते थे।

पुजारी ने बतलाया 'सोने की छत महाराजा रणजीत सिंह ने चढ़वाई और चांदी का द्वार उनके पुत्र की भक्ति का प्रतीक है।' साथ ही उन्होंने वह कथा भी बतलाई कि अकबर ने माई का तेज देखने के लिए लोहे के सात मोटे मोटे तवों से ज्वाला को ढंक कर बुझाना चाहा, पर माई सातों तवों को तोड़ कर प्रकट हो गई। अकबर ने फिर नहर से पानी लाकर डाला, पर माई का बाल भी बांका न हो सका।

ऐसे याद आई बाकू की ज्वालामाई

हमें इन कथाओं को सुनने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि हम उन्हें पहले ही पढ़ चुके थे जिनमें अकबर के देवी भक्त बन जाने की बात आई थी। हां, उस समय 38 साल पहले सुनी बाकू से लौटे उस तरुण साधु की बात याद आ रही थी जो कह रहा कि बड़ी ज्वालामाई रूस के मुलक में हैं।

कांगड़ा की ज्वालामाई तो छोटी ज्वालाजी हैं। शायद छोटी बड़ी से उसका ख्याल छोटी बड़ी टेम से था, यहां टेमें छोटी छोटी थी, पर बाकू की ज्वालामाई की टेमें इससे बड़ी थीं। इसको मैं प्रत्यक्ष नहीं देख पाया। 1935 में वहां पहुंचने से पहले ही बड़ी ज्वालामाई सुरधाम चली गई थीं। बोलशेविक अकबर की तरह के ह्दय वाले नहीं थे।

उन्होंने कहाः चारों तरफ पेट्रोल के जबरदस्त क्षेत्र में इस गैसमयी ज्वाला का रहना खतरे से खाली नहीं है, इसीलिए इसे बुझा देना ही अच्छा है। उन्होंने वैसा ही किया। मुसलमानों के देश में किसी सोने चांदी से भरे मंदिर का बनवाना बुद्घि सहमत काम नहीं था। यदि बाकू में व्यापार करने वाले सिंधी सेठ धन खर्च करने के लिए तैयार भी होते, तो भी वैभव में बाकू की बड़ी बहिन अपनी भारतीय छोटी बहिन का मुकाबला नहीं कर सकती थीं।

मंदिर के भीतर देखा ये सब

मंदिर के स्‍थान पर वहां चार साधारण खंभों पर उठी एक छतरी थी। आंगन के चारों ओर मठ की कोठरियां थी जिसका फाटक दुमहला तथा उस पर उल्टा लगा हिंदी का शिलालेख अवश्‍य आकर्षक था।

दोनों ज्वालामुखियों के दर्शन करके हो नहीं सकता कि उन घुमक्कड़ का स्मरण न हो आता जो कूपमंडूकता के लिए बदनाम इसी भारत में पैदा होकर सैंकड़ों वर्षों तक हजारों की तादाद में सभ्यता से भी दूर के देशों में जा गुमनाम रेत पर की रेखा की तरह विलीन विस्मृत हो गए।

पर जिनके ही खून ने हमारी धमनियों में जोर मार कर उनके पथ पर हमें बलात डाल दिया। हमार साधु परम घुमक्कड़ थे और आज भी है। हमें आशा है, धर्म का भविष्य चाहे कुछ भी हो पर हमारी जनता उनका सत्कार और आतिथ्‍य करने में कभी पीछे नहीं रहेगी।

ऐसे आगे बढ़ी यात्रा

मंदिर से निकल कर हमने किसी अखाड़े को देखना चाहा। किसी समय कांगड़ा साहसी सन्यासी, नागा, साधुओं का एक अच्छा केंद्र था जहां से वह मध्य एशिया और तिब्बत तक अपना व्यापार करते थे। हमारे मन में लालसा छिपी हुई थी कि वहां शायद कोई कागज पत्र मिल जाए।

अखाड़े के जगह थोड़े से उदास श्रीहीन मकान थे जिनमें से एक की कोठरी में एक साधु धुनी रमाए कितने ही महीनों से बैठें हैं। घुमक्कड़ों का वंश अभी ‌उच्छिन नहीं हो सकता, यह सोचकर मन में बड़ा आनंद हुआ और धुआं और गरमी होने पर भी हम वहां बैठकर कुछ देर तक बात करते रहे।

यदि खाकर न गए होते तो साधु के टिक्कड़ में भी शामिल हो गए होते। क्षमा मांगते रुपया उनके सामने रखा और प्रणाम कर वहां से उठे। घुमक्कड़ के समागम का आनंद घुमक्कड़ ही जानता है।
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खत्म हुई यात्रा

हम बस के बारे में कुछ निश्चिंत थे, इसलिए जल्दी नहीं कर रहे थे। अड्डे पर पहुंचे तो मालूम हुआ कि कुछ मिनट पहले ही बस चली गई। लोग यह भी बतला रहे थे कि बस मिलने की संभावना कम ही है। हम निराश थे, इसी समय एक बस ने आकर मुसाफिरों को ढूंढना शुरू किया। हम दोनों पहले से ही उम्मीदवार थे, लेकिन जब तक काफी सीटें भर न जाएं सिर्फ दो आदमियों को लेकर वह थोड़े ही जा सकती थी।

हम तब तक अधर में लटके रहे, जब तक कि साढ़े तीन बजे कुछ और सवारियों को लेकर बस रवाना नहीं हो गई। ड्राइवर ने कह दिया था कि हम ज्वालामुखी रोड तक पहुंचा सकते हैं। यद्यप‌ि कांगड़ा पहुंचने की गारंटी नहीं थी लेकिन वहां रेल भी थी और पठानकोट की सड़क पर होने से बसों का आना जाना भी ज्यादा था। यद्यपि आशा तंतु बहुत दुर्बल था किन्तु कुछ ही देर की प्रतीक्षा के बाद एक बस आई।

जिसमें एक ही आदमी की जगह खाली थी। पहले सोचा, हमें से एक ही चला जाए लेकिन दोनों को शरण मिल गई और सात बजे से पहले हम कांगड़ा पहुंच गए। धर्मशाला की बस के बारे में पूछने पर मालूम हुआ कि वही बस वहां जा रही है। जल्‍दी जल्दी में सामान उठवाकर बस में रखा और धर्मशाला की ओर चल पड़े।
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