चीड़ के पेड़ से निकलने वाली पाइन नीडल (चलारू) अब हिमालय पर्यावरण और वन्य जैव विविधता के लिए खतरा नहीं बनेगी। पाइन नीडल को कोयले और लकड़ी की तरह इंधन के रूप में खाना बनाने से लेकर उद्योगों तक में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह संभव होगा एक खास तकनीक से जिसे आईआईटी मंडी के सेंटर फॉर इनोवेटिव टेक्नोलॉजी फॉर द हिमालयन रीजन ने विकसित किया है।
इस तकनीक में पाइन नीडल के अतिरिक्त लकड़ी के बुरादे, गन्ने की छाल, चावल के पुआल और गेहूं के पुआल को मिलाकर ब्रिकेट (ईंधन) तैयार किया जाएगा। पाइन नीडल को अन्य बायोमास में मिश्रित करके तैयार इंधन यानी ब्रिकेट कम लागत पर अधिक ताप प्रदान करते हैं और लकड़ी या कोयले की तुलना में पर्यावरण को कम हानि पहुंचाते हैं। ईंधन के रूप में लकड़ी और कोयले के स्थान पर इन ब्रिकेटों का कई छोटे और बड़े उद्योगों में उपयोग किया जा सकता है।
इनका उपयोग खाना पकाने में भी किया जा सकता है, वहीं उद्योगों में प्रोडक्शन के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। इसका खुलासा आईआईटी मंडी के कैंपस में आयोजित वर्कशॉप में हुआ है। आईआईटी मंडी परिसर में केंद्र का अपना ब्रिकेट और पैलेट उत्पादन संयंत्र है। सरकार ने पाइन नीडल आधारित संयंत्रों के लिए पूंजीगत व्यय पर एक इकाई के लिए 50 प्रतिशत, 25 लाख तक की सब्सिडी की घोषणा भी कर दी है।
अभियान होगा सफल : डॉ. आरती कश्यप
सेंटर फॉर अपलिफ्टिंग हिमालयन लाइवलीहुड (यूएचएल) की प्रधान परियोजना परीक्षक डॉ. आरती कश्यप ने कहा कि यह तकनीक काफी बेहतर है। गर्मियों में सबसे अधिक नुकसान पाइन नीडल से होता है। सरकार और आईआईटी जैसे प्रौद्योगिकी संस्थानों के एकजुट प्रयास से यह अभियान सफल होगा। समूह में मशीन लगाकर जंगलों के निकलने वाले चलारू को एकत्र कर इंधन तैयार किया जा सकेगा।
सरकार ने दी मंजूरी, आवेदन वन विभाग के कार्यालय में करें
डीएफओ एसएस कश्यप भी शिविर में मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि आईआईटी ने इस मशीन को स्थापित किया है। लोग यह मशीन समूह और व्यक्तिगत स्तर पर बिना किसी परेशानी के स्थापित कर सकते हैं। सरकार ने इसे मंजूरी दी है। सरकार ने न केवल सब्सिडी की घोषणा की है बल्कि इनके संग्रह के काम में मदद देने को भी तैयार है। इसके लिए वन विभाग के कार्यालय में आवेदन किया जा सकता है।