जायका और पौष्टिक मूल्यों में सर्वोत्तम देश के पहाड़ी और मैदानी आलू की पैदावार अब किसान रोगों से समय रहते बचा सकेंगे। एक विशेष एप के जरिये स्मार्ट फोन में आलू के पत्तों की तस्वीर खींचते ही किसानों को रोग और दवा की सटीक जानकारी मिलेगी। स्वचलित कम्प्युटेशनल मॉडल से यह संभव होगा। इसे आईआईटी मंडी और सीपीआरआई शिमला के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है।
आम किसानों के लिए इस टूल को स्मार्ट फोन एप्लीकेशन में बदलने की कवायद शुरू हो गई है। इसमें परिणाम 98 फीसदी तक सही मिले हैं। यह शोध प्लांट फीनोमिक्स जर्नल में प्रकाशित किया गया है। देश भर में हिमाचल में लाहौल, बरोट, शिमला, चंबा और ऊना का आलू प्रसिद्ध है। शोध का वित्तीयन जैव प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार ने किया है।
पत्तों की तस्वीरों से कुल मिलाकर 98 प्रतिशत सटीक परिणाम सामने आए हैं। आलू भले ही दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में भोजन का मुख्य हिस्सा नहीं है, पर यह एक नगदी फसल है। इसके असफल होने से छोटे किसान बरबाद हो सकते हैं। इसलिए रोग का जल्द पता लगना जरूरी है।
- डॉ. श्रीकांत श्रीनिवासन, एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ कंप्यूटिंग एवं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, आईआईटी मंडी
पंजाब और यूपी से डाटा किया एकत्र
आईआईटी मंडी के वैज्ञानिकों ने जिस कम्प्यूटेशनल टूल का विकास किया है, उससे आलू के पत्तों की तस्वीरों से इस फसल में ब्लाइट का पता लगा सकता है। इस मॉडल के विकास में एआई टूल का उपयोग किया गया गया है, जिसे मास्क क्षेत्र-आधारित कन्वेन्शनल न्यूरल नेटवर्क आर्किटेक्चर कहते हैं।
यह पौधे और मिट्टी की जटिल पृष्ठभूमि के बावजूद पत्तों के रोगग्रस्त हिस्सों को सटीक दर्शा सकता है। मॉडल के विकास के लिए पंजाब, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के खेतों से स्वस्थ और रोगग्रस्त पत्तों के डाटा एकत्र किए गए। यह मॉडल पूरे देश में पोर्टेबल हो इसे विशेष महत्व दिया गया है। - जानसर, रिसर्च स्कालर आईआईटी मंडी