आईआईटी मंडी ने शोधकर्ताओं ने मिलीमीटर के हजारवें हिस्से के आकार की लाइसोसोम कोशिका की उपसंरचना के आंतरिक ढांचे के अध्ययन का सूक्ष्म तरीका खोज निकाला है। इस शोध की मदद से भारत में तेजी से बढ़ रही दिमाग की बीमारी (न्यूरो डिजनरेशन), प्रतिरोधक क्षमता की कमी और कैंसर के कारणों को समझना आसान होगा और बेहतर दवा अनुसंधान के मार्ग भी प्रशस्त होंगे।
अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी के सहयोग से इस शोध को पूरा किया गया है। इसके परिणाम प्रतिष्ठित पत्रिका अमेरिकन केमिकल सोसाइटी मैटीरियल लेटर्स में प्रकाशित किया गया है। शोध के सह लेखक आईआईटी मंडी के स्कूल आफ बेसिक साइंसेज के प्रो. छायन के नंदी के अनुसार लाइसोसोम आकार में माइक्रोन या मिलीमीटर के हजारवें हिस्से के बराबर होता है।
लाइसोसोम के काम नहीं करने के कारण न्यूरोडिजेनेरेटिव डिसार्डर, प्रतिरोधी प्रणाली संबंधी डिसऑर्डर, कैंसर सहित विविध प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। इस कोशिका के अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं मैटल नेनोकलस्टर तकनीक का उपयोग किया है। इस प्रक्रिया को स्ट्रक्चर्ड इल्यूमिनेशन माइक्रोस्कोपी कहते हैं। इस कोशिका को समझने के लिए रंगों के बजाय सोने और चांदी जैसे खास तरह के धातुओं के कलस्टर का प्रयोग किया गया है, जो मानव के बाल की चौड़ाई के एक लाख गुणा छोटा है। इससे कोशिका के स्ट्रक्चर को आसानी से समझा गया।
बेकार कोशिकाओं को नष्ट करते है लाइमोसोम
शोधार्थी आदित्य यादव के अनुसार कि लाइसोसोम जीवित कोशिका का एक महत्वपूर्ण तत्व है। यह विभिन्न कोशिका प्रक्रियाओं में शामिल होता है तथा माइटोकोंड्रिया जैसे कोशिका तत्वों के साथ संवाद करता है। लाइसोसोम में बैक्टिरिया नष्ट करने की क्षमता है। अगर किसी कोशिका के नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती है, तब लाइसोसोम उसे स्वयं नष्ट करने में मदद करता है।
लाइसोसोम के काम नहीं करने के कारण न्यूरोडिजेनेरेटिव डिसऑर्डर, प्रतिरोधी प्रणाली संबंधी डिसऑर्डर, कैंसर सहित विविध प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए लाइसोसोम के ढांचे और कामकाज के विश्लेषण और उस पर नजर रखने से रोगों का पूर्वानुमान लगाने में मदद मिलती है और इन रोगों के लिए नई दवाओं के विकास करने में मार्गदर्शन मिलता है।