अदालत ने चिंता व्यक्त की कि ये दवाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (भारत सरकार) को इस मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया है।
वहीं, अदालत ने इस मामले को इसी तरह की एक अन्य लंबित जनहित याचिका के साथ सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह कार्रवाई मुख्य न्यायाधीश को सचिवालय से प्राप्त एक पत्र और समाचार पत्रों में छपी रिपोर्टों के आधार पर की है। रिपोर्ट के अनुसार ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने राज्य दवा प्राधिकरण को बद्दी, सोलन, पांवटा साहिब और कांगड़ा में 19 दवा कंपनियों की ओर से निर्मित 26 दवाओं के निर्माण और वितरण को तुरंत रोकने का निर्देश दिया है।
विशेष न्यायाधीश दविंदर कुमार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम की धारा 12(2) के तहत यह आदेश दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद फर्जी डिग्रियां बेचकर जुटाई संपत्तियां अब केंद्र सरकार के अधिकार में आ गई हैं। ये संपत्तियां मुक्त रूप से केंद्र सरकार को हस्तांतरित कर दी गई हैं। जांच के अनुसार यूनिवर्सिटी के मुख्य प्रमोटर राज कुमार राणा, उनकी पत्नी अशोनी कंवर और बेटे मंदीप राणा ने एजेंटों-छात्रों को मोटी रकम लेकर फर्जी डिग्री, डिप्लोमा और डीएमसी बेची थीं।
इन फर्जी डिग्रियों को विवि के नाम पर जारी किया जाता था। जांच में 387 करोड़ के प्रॉसीड्स ऑफ क्राइम का पता चला। ये पैसे बैंक खातों में डाले और फिर परिवार की कई चल-अचल संपत्तियों में लगाए गए। मंदीप ने अवैध फंड्स को अपनी सैलरी के रूप में दिखा इनकम टैक्स रिटर्न में प्रोजेक्ट किया। वास्तव में उन्होंने यूनिवर्सिटी में कभी काम नहीं किया था। ईडी ने 29 जनवरी 2021 को प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया था। अब तक इस मामले में करीब 200 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच की जा चुकी हैं।