घटिया दवाइयों के उत्पादन मामले में सरकार को जवाब दायर करने के आदेश
हाईकोर्ट ने घटिया दवाइयों के उत्पादन और इसके लिए प्रयोगशाला न होने के मामलों की सुनवाई एक साथ निर्धारित की है। अदालत ने घटिया दवाइयों के उत्पादन के मामले में सरकार को जवाब दायर करने के आदेश दिए हैं। अदालत को बताया गया कि परीक्षण के लिए प्रयोगशाला न होने से घटिया दवाइयों का उत्पादन हो रहा है। प्रयोगशाला न होने का अदालत ने पहले ही संज्ञान लिया है। बता दें कि घटिया दवाइयों के उत्पादन को लेकर दैनिक समाचार पत्रों में छपी खबर पर अदालत ने जनहित याचिका दर्ज की है। खबर में उजागर किया गया है कि राष्ट्रीय औषधि नियामक और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने हिमाचल में निर्मित 12 दवा के नमूनों को घटिया घोषित किया है। एक नमूने को नकली पाया गया। नकली पाई जाने वालों में एक पशु चिकित्सा की दवा भी शामिल है।
हिमाचल से घटिया घोषित की गई दवाओं में एस्ट्राजोल इंजेक्शन, एस्ट्रीजोल टेबलेट, मिसोप्रोस्टोल टेबलेट, एमोक्सिसिलिन कैप्सूल, पैरासिटामोल ओरल सस्पेंशन, फिनाविव टेबलेट, पैंटोप्राजोल, डोमपेरिडोन कैप्सूल, रैंटिडिन हाइड्रोक्लोराइड टेबलेट और लेवोसेटिरिजिन और इबुप्रोफेन टेबलेट शामिल हैं। इसके अलावा सूबे में दवाइयों के परीक्षण प्रयोगशाला न होने पर भी अदालत ने जनहित याचिका दर्ज की है। वर्ष 2017 में सेंट्रल बैंक ने बद्दी में दवाइयों के परीक्षण के लिए प्रयोगशाला के निर्माण के लिए राशि स्वीकृत की थी। वर्ष 2014 में उद्योग विभाग की ओर से 3.50 करोड़ रुपये प्रयोगशाला के निर्माण के लिए खर्च किए गए है। लेकिन, अभी तक इसे चालू नहीं किया गया है। इसके अलावा केंद्र सरकार ने 12वीं पंच वर्षीय योजना के तहत 30 करोड़ रुपये की राशि जारी की थी। आरोप लगाया गया है कि दवाइयों के परीक्षण के लिए प्रयोगशाला न होने के कारण घटिया दवाइयों का उत्पादन किया जा रहा है।