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सीपीएस की नियुक्तियों पर सरकार ने हाईकोर्ट में दिया ये जवाब

Thu, 29 Dec 2016 10:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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हिमाचल में मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्तियों के मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में जवाब दिया है कि ये नियुक्तियां हिमाचल प्रदेश संसदीय सचिव अधिनियम 2006 के तहत की गई हैं। सभी नियुक्तियां कानूनन सही हैं। सरकार ने कहा है कि प्रार्थी संस्था ने याचिका में कई महत्वपूर्ण पहलुओं को छिपाया है। याचिका भी देरी से दायर की गई है। प्रार्थी संस्था का इस याचिका को दायर करने का कोई औचित्य नहीं है।
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सरकार की आपत्तियों पर प्रार्थी संस्था पीपल फॉर रेसपॉंसिबल गवर्नेंस ने जवाब देने के लिए समय मांगा, जिसे स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने मामले को एक मार्च 2017 को लिस्ट करने के आदेश दिए।

प्रार्थी संस्था का कहना है कि सीपीएस को मंत्री के बराबर भत्ते जैसे टीए, डीए, मेडिकल सुविधाएं दी जाती हैं। इन्हें मंत्रियों के बराबर शक्तियां हैं। ये किसी भी सरकारी फाइल को देखने की शक्ति रखते हैं। प्रार्थी के अनुसार वास्तव में संविधान के प्रावधानों को नजरअंदाज कर राजनीतिक संतुलन को बनाने की दृष्टि से इनकी नियुक्तियां की गई हैं।
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याचिका में लगाए गए ये आरोप

सीपीएस की नियुक्तियां कानून के प्रावधानों के विपरीत हैं
सीपीएस मंत्रियों के बराबर वेतन और अन्य सुविधाएं ले रहे हैं, जो हाईकोर्ट के एक निर्णय के विपरीत है
सीपीएस की नियुक्तियों को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट भी गैरकानूनी ठहरा चुका है
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 में संशोधन के मुताबिक किसी भी प्रदेश में मंत्रियों की संख्या विधायकों की कुल संख्या का 15 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती
हिमाचल में सीपीएस को नियुक्ति देने के बाद मंत्रियों की संख्या 15 फीसदी से अधिक हो गई है, जिस कारण सीपीएस की नियुक्तियों को रद्द किया जाना चाहिए

प्रदेश में 10 सीपीएस
22 जनवरी 2013 को नीरज भारती, राजेश धर्माणी, विनय कुमार और 13 मई 2013 को जगजीवन पाल, राकेश कालिया, नंद लाल, रोहित ठाकुर, सोहन लाल ठाकुर और इंद्र दत्त लखनपाल और उसी साल 22 अक्तूबर को मनसा राम को सीपीएस नियुक्त किया गया।
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न्यायिक मामलों के दस्तावेज समय से दें अफसर : हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिए हैं कि वह संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देश दें कि न्यायिक मामलों में काम आने वाले दस्तावेजों को कानून के दायरे में रहकर अविलंब जारी करें। न्यायाधीश धर्मचंद चौधरी ने दस्तावेजों को जारी करने में देरी करने वाले अधिकारियों तथा कर्मचारियों के खिलाफ  भी उपयुक्त कार्रवाई करने के आदेश दिए।

उल्लेेखनीय है कि न्यायिक मामलों में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश दस्तावेज संबंधित कर्मियों की ओर से देरी से जारी करने के कारण अनेकों लोगों को समय पर उनका हक नहीं मिल पाता। कोर्ट के समक्ष आए मामले में अपीलकर्ता को प्रतिवादी पक्ष का मृत्यु प्रमाण पत्र पंचायत सचिव की ओर से नहीं दिया जा रहा था।

इस कारण वह कोर्ट के अपने मामले में उचित कदम नहीं उठा पा रहा था। इसी कारण कोर्ट में मामले के निपटारे में विलंब हो रहा था। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि सरकारी तंत्र के उदासीन रवैये के कारण कोर्ट की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है।
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