जयराम सरकार ने अपने एक माह के कार्यकाल में इस मामले को लेकर कोई फैसला नहीं लिया है। प्रदेश के लाखों भवन मालिक सरकार की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। इसके अलावा पुलिस और एचआरटीसी में भर्ती प्रक्रिया भी ठप पड़ी हुई है।
सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षाएं शुरू करने और प्रदेश में इलेक्ट्रिक बसें चलाने के मामले को लेकर भी सरकार अभी तक अपना मत स्पष्ट नहीं कर सकी है। प्रदेश में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना तो दूर वर्तमान उद्योगों के पलायन को रोकने के लिए भी सरकार टैक्स में छूट देने को लेकर फैसला नहीं ले सकी है।
इसके अलावा चाय बागान भूमि उपयोग के नियमोंको बदलने और सोने की रिफाइनरी को राहत देने का मामला भी अभी लटका हुआ है। पूर्व सरकार के समय लिए गए इन फैसलों को लेकर अफसरशाही भी जयराम सरकार के समक्ष उठाने से कतरा रही है। तबादलों के खेल में उलझे अफसर इन जरूरी प्रस्तावों की पैरवी करने से कतरा रहे हैं, जिसका खामियाजा प्रदेश की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।