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बड़ी राहत: बागवानों को अब 400 रुपये में मिलेगा अमेरिकी सेब का पौधा, उद्यान निदेशालय ने दाम घटाए

Fri, 21 Jan 2022 12:00 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

बागवानों को अमेरिका से आया सेब का पौधा 400 रुपये प्रति पौधे की दर से बेचा जाएगा। राज्य उद्यान निदेशालय ने सेब के पौधे के रेट घटा दिए हैं। विभाग की ओर से इस बारे में गठित कमेटी की सिफारिशों के बाद ये दाम तय किए गए हैं।
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सेब(फाइल) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश में सेब बागवानों को अमेरिका से आया सेब का पौधा 400 रुपये प्रति पौधे की दर से बेचा जाएगा। राज्य उद्यान निदेशालय ने सेब के पौधे के रेट घटा दिए हैं। सेब बागवानों के लिए सब्सिडी बढ़ाई गई है। पिछले वर्ष ये पौधे 750 रुपये प्रति पौधे की दर से मिल रहे थे। ये विदेशी पौधे हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास परियोजना के तहत बनाए गए क्लस्टरों में शामिल सेब बागवानों भी दिए जा रहे हैं। विभाग की ओर से इस बारे में गठित कमेटी की सिफारिशों के बाद ये दाम तय किए गए हैं। सेब के अलावा अमेरिका से आए नाशपाती, चेरी, आड़ू, प्लम और एप्रिकॉट के पौधे भी 400 रुपये की दर से ही मिलेंगे। विश्व बैंक से वित्तपोषित 1100 करोड़ रुपये की परियोजना के तहत इन्हें उपलब्ध करवाया जा रहा है। 

स्थानीय नर्सरियों के पौधे डेढ़ सौ रुपये में 

क्लस्टरों में शामिल बागवानों को स्थानीय नर्सरियों के पौधे भी अब डेढ़ सौ रुपये के हिसाब से बिकेंगे। सेब, चेरी, नाशपाती, प्लम, अखरोट और एप्रिकॉट के पौधे डेढ़ सौ रुपये के हिसाब से मिलेंगे, जबकि सेब, चेरी, नाशपाती, प्लम और आड़ू के रूट स्टाक 100 रुपये की दर से बेचे जाएंगे।  

हम तो मुफ्त दे रहे थे, विश्व बैंक ने कीमत लेने को कहा  

 इस बारे में बागवानी निदेशक आरके प्रुथी का कहना है कि इस परियोजना के चालू होने के बाद ये पौधे किसानों को विभाग की ओर से मुफ्त में दिए जा रहे थे, मगर विश्व बैंक ने कहा है कि बागवानों से सेब के पौधों कीमत ली जानी चाहिए। इसीलिए पिछले साल 750 रुपये की दर से पौधे बेचे गए थे। 

सेब बागवानों ने विश्व बैंक के इस प्रोजेक्ट पर फिर सवाल खड़ा 

सेब बागवानों ने विश्व बैंक के इस प्रोजेक्ट पर फिर सवाल खड़ा किया है। सेब बागवान देवेंद्र बुशहरी ने कहा कि अगर किसानों को विदेशी पौधे और स्थानीय इतने रेट पर देने हैं तो सरकार की सहायता में क्या आता है। ऐसे में परियोजना का क्या मतलब है। वे इन्हें विदेशों से खुद ही क्यों न मंगवा लें। निजी दरें भी यही हैं। स्थानीय नर्सरियों के पौधे के रेट भी ज्यादा है। यह प्रोजेक्ट के नाम पर बागवानों से धोखा है। इतने ज्यादा रेट सही नहीं हैं। विश्वविद्यालय के रेट अलग हैं। 

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