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फ्लैश बैक: हिमाचल में कभी हाथ उठाकर और रस्सी खींचकर चुने जाते थे पंचायत के मुखिया, विधायक का रहता था दखल

Mon, 11 May 2026 02:40 PM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।

सार

हिमाचल प्रदेश में आज जहां  पंचायत चुनाव बैलेट और ईवीएम आधारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कराए जाते हैं, वहीं वर्ष 1995 से पहले गांवों में प्रधान और अन्य प्रतिनिधियों का चयन कुछ अलग तरीके से होता था। पढ़ें पूरी खबर...
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश की पंचायतीराज व्यवस्था का इतिहास बेहद दिलचस्प और लोक परंपराओं से जुड़ा रहा है। आज जहां पंचायत चुनाव बैलेट और ईवीएम आधारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कराए जाते हैं, वहीं वर्ष 1995 से पहले गांवों में प्रधान और अन्य प्रतिनिधियों का चयन पारंपरिक तरीकों से होता था। उस दौर में कई पंचायतों में हाथ खड़े कर, लाइन लगाकर और रस्सी खींचकर प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता था। कई स्थानों पर आम सहमति से मुखिया चुनने की परंपरा भी लंबे समय तक कायम रही।

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यदि किसी पद के लिए एक से अधिक दावेदार होते थे तो ग्रामीण सभा बुलाई जाती थी। इसमें उम्मीदवारों के समर्थन में लोग हाथ खड़े करते थे और बहुमत के आधार पर विजेता तय किया जाता था। कई क्षेत्रों में प्रत्याशियों के समर्थन में अलग-अलग पक्ष रस्सी पकड़कर खड़े होते थे और जिस ओर अधिक लोग होते थे, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता था। कुछ गांवों में उम्मीदवारों को अलग-अलग स्थानों पर खड़ा किया जाता था और जिनके पीछे अधिक ग्रामीण खड़े होते थे, वही मुखिया चुना जाता था। 

वर्ष 1990 तक जिला परिषद और पंचायत समिति के गठन की प्रक्रिया भी अलग थी। उस समय सांसद और विधायक पंचायत समिति तथा जिला परिषद सदस्यों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। कई मामलों में अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लागू रहती थी, जिसके कारण जनप्रतिनिधियों का चयन सीधे जनता के मतदान से नहीं होता था। बाद में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने के लिए चुनाव प्रणाली में बड़े बदलाव किए गए। हिमाचल में पंचायतीराज व्यवस्था को नया स्वरूप वर्ष 1995 में मिला, जब पहली बार राज्य निर्वाचन आयोग का गठन किया गया। 

इसके बाद पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद चुनावों को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से कराने की जिम्मेदारी आयोग को सौंपी गई। उसी वर्ष बैलेट पेपर के माध्यम से पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव आयोजित किए गए, जिससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ी और आम मतदाता की भागीदारी मजबूत हुई। राज्य निर्वाचन आयोग के गठन के बाद आचार संहिता, मतदाता सूची, मतदान केंद्र, नामांकन जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं। 

पंचायतीराज विभाग के अतिरिक्त निदेशक केवल शर्मा ने कहा कि हिमाचल की पंचायतीराज व्यवस्था ने पिछले तीन दशकों में लंबा सफर तय किया है। पारंपरिक सहमति आधारित चुनाव से निकलकर आज प्रदेश की पंचायतें मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं के रूप में स्थापित हुई हैं, जिनमें महिलाओं, युवाओं और अनुसूचित वर्गों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। 
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हाथ खड़े कर चुनते थे
जिला शिमला के बडश निवासी 95 वर्षीय लक्ष्मी चंद शर्मा कहते हैं कि लोकतंत्र का स्वरूप काफी बदला है। पहले के चुनाव वाली अब बात कहां। आपसी तालमेल से भी पंचायत प्रधान बने हैं। हाथ खड़े करके भी प्रधान को चुना जाता था। 

पोस्टर, वोटर सूची नहीं
जिला शिमला के 89 वर्षीय पड़ेची निवासी अमीचंद ठाकुर ने कहा कि पहले पोस्टर, मतदाता सूचियां का नाम नहीं होता था। साल में एक बार चौराहे पर लोग एकत्र होते थे। धर्म-कर्म और मिलन सार व्यक्ति को मुखिया चुना जाता था।  

अब वो बात कहां
कोटखाई निवासी सेवानिवृत्त मास्टर 89 वर्षीय जयराम ने कहा कि समय के साथ साथ जमाना भी बदलता जा रहा है। जो पहले बात थी, अब वह कहां है। उस जमाने में तो रस्सी खींचकर भी पंचायत प्रधान चुने जाते थे। 
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