रफीक मुहम्मद ने बताया कि 80 के दशक में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक कार्यक्रम में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन और शहनाई वादक उस्ताद बिसमिल्लाह खां के सामने प्रस्तुति देने का मौका मिला था।
पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमन और उस्ताद बिसमिल्ला खां से मिली प्रशंसा ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। रफीक मुहम्मद हिमाचल के बाहर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और लुधियाना सहित अन्य राज्यों में भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शहनाई की धुनों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर चुके हैं।
झुंझु अली से सीखी शहनाई की कला
साल 1935 में धर्मशाला के खनियारा में जन्में रफीक मुहम्मद अपने जीवन के 80 बसंत देख चुके हैं। शहनाई वादन उनका पारिवारिक पेशा रहा है। शहनाई वादक झुंझु अली से उन्होंने इसकी शिक्षा हासिल की। लोक वाद्य यंत्र बजाने की कला को वह अपने तक सिमित नहीं रखना चाहते। इसलिए उन्होंने अपने बेटे मुनीर रियाजी और इम्तियाजी को भी नगाड़ा और ढोलक बजाना सिखाया है। उनका पोता इमरान भी ढोलक बजाना शुरू हो गया है।
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