फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कुछ सैलड़ियां, कुछ पीलड़ियां ने दिलाई निम्मो को पहचान

Tue, 08 Oct 2019 10:53 AM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धर्मशाला
विज्ञापन
- फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

इक जोड़ा सूटे दा...., कुछ सैलड़ियां, कुछ पीलड़ियां गाने से लोक गायकी में ख्याति पाने वाली निम्मो चौधरी ने सरकारी स्कूलों में शनिवार को होने वाली बाल सभा से गाना शुरू किया। वर्तमान में दूरदर्शन और आल इंडिया रेडियो में बी हाई ग्रेड की कलाकार हैं। निम्मो चौधरी ने जब गाना शुरू किया था, उस समय समाज ने कई बातें कीं।

विज्ञापन


घर वालों को भी बेटी को गाने से रोकने के लिए उकसाते, लेकिन पिता-माता ने पूरा साथ दिया। शादी के बाद सास-ससुर और पति ने भी गाने के लिए निम्मो को प्रेरित किया। बचपन में पिता भगवान दास के लिखे गीत गाने वाली निम्मो चौधरी के अब तक 30 से 40 ऑडियो-वीडियो मार्केट में आ गए हैं।

साल 1995 में उनकी पहली कैसेट मार्केट में आई थी, जिसमें उन्होंने चंबा हरेया-भरेया, लोक गायक करनैल राणा के साथ कुछ सैलड़ियां, कुछ पीलड़ियां और इक जोड़ा सूटे दा गीत गाया। 1997 में मेंहदी रोंगलिए, 2004 में फुहार, जबकि साल 2014 में में चंबियाली गीतों की एलबम आई थीं। निम्मो चौधरी ने हायर सेकेंडरी तक पढ़ाई की है। उन्हें अखिल भारतीय लोक कला महोत्सव में कलारत्न के अवार्ड से नवाजा गया है।
विज्ञापन


हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं। निम्मो का जन्म लदवाड़ा में पिता भगवान दास और माता गुरु देवी के घर हुआ था। 1997 में कांगड़ा के मटौर में देविंद्र कुंद्रा के साथ विवाह हुआ। निम्मो के  बेटे संजय कुंद्रा स्नातक कर चुके हैं। वह राष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी है। बेटी पारुल कुंद्रा ने बीटेक किया है।

सरकार के लिए किया काम, लेकिन हुई अनदेखी
निम्मो चौधरी की सरकार से यही नाराजगी है कि लोक संस्कृति के लिए उन्होंने पूरी उम्र लगा दी। साल 1993 में लोक संपर्क विभाग में बतौर कैजुअल आर्टिस्ट काम शुरू किया, लेकिन ढाई दशक बाद भी उन्हें नियमित नहीं किया गया। निम्मो का कहना है कि लोक संस्कृति के लिए काम करने वालों की अनदेखी अच्छी नहीं है।

लोक गीतों को न तरोड़े-मरोड़ें युवा : निम्मो
निम्मो चौधरी ने कहा कि युवा लोक गीतों को तरोड़-मरोड़ कर गा रहे हैं। इससे हमारी लोक संस्कृति विलुप्त हो जाएगी। आने वाले बच्चों को हम कुछ नहीं दे सकेंगे। यदि संस्कृति को बचाना है तो इसके साथ तरोड़-मरोड़ से बचना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें