शाह की दो दिवसीय चुनावी कार्यशाला के बाद भाजपा चुनावी समर में उतर गई। हर विधानसभा में भाजपा के परिवर्तन रथ दौड़े तो कांग्रेस की नींद टूटी। कांग्रेस ने रथयात्रा के जवाब में पदयात्रा शुरू की, लेकिन सरकार और संगठन के बीच तालमेल न होने से पार्टी पहले चरण के बाद हांफ गई।
भाजपा के संगठित चुनाव प्रचार के मुकाबले में कांग्रेस जब पिछड़ी तो पार्टी हाईकमान ने वीरभद्र सिंह को चुनाव की कमान सौंपी। इसके बाद दोनों ओर से प्रचार, आरोप-प्रत्यारोप और सियासी दांव पेच की असल जंग शुरू हुई।
भाजपा के मुख्यमंत्री चेहरा नहीं देने पर वीरभद्र सिंह ने भाजपा को बिना दूल्हे की बारात की संज्ञा दे दी। वीरभद्र का दूल्हे वाले जुमला खूब चला।
भाजपा ने आखिरी समय में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किया। धूमल के सुजानपुर सीट से उतार चुकी भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका उनकी हार से लगा।
धूमल एक समय में करीबी रहे राजेंद्र राणा से हार गए। धूमल के कई करीबी भी चुनाव हार गए, लेकिन पार्टी 44 सीटें जीत गई। उनकी हार के बाद भाजपा को नया मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के तौर पर तय करना पड़ा।
हिमाचल ने पहली बार अलग तरह का चुनाव प्रचार देखा। भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी यह बिल्कुल नया रहा। प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को आगे रख चुनाव में उतरी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की टीम को चुनौती देने के लिए वीरभद्र अकेले डटे रहे।
चुनाव निकट आए तो वीरभद्र के प्रचार तंत्र के मुकाबले भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों को उतार दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने सात रैलियां कर चुनावों का रुख ही मोड़ दिया। कांग्रेस स्टार प्रचार में जूझती दिखी। राहुल गांधी एक दिन के लिए हिमाचल आए।
वीरभद्र सिंह के उनका आखिरी चुनाव होने का एलान पार्टी की सियासी नैया तो पार नहीं करवा सका, लेकिन उनके बेटे विक्रमादित्य ने सियासी पारी का आगाज किया। पार्टी हार गई, लेकिन वीरभद्र सिंह अपना और बेटे का चुनाव जीत गए।
प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू की जीत उनके खेमे को संजीवनी दे गई। हार के बावजूद वीरभद्र और सुक्खू खेमे के बीच मतभेद जस के तस हैं। पार्टी के लिए आने वाले समय में इस खींचतान से निपटना बड़ी चुनौती है।